चाँद के दीदार को,
निशा जब छन् से,
धरा पर कदम,
रखती है!
ना जाने क्यों,
बरबस ही तुम,
याद आ जाते हो!
हृदय के तार,
झंकृत होते हैं!
मन भी तेरी बातें,
सुनने को,
मचलता है!!
मैं खुद को रोक,
नहीं पाती हूँ!
दिल की,
नादानियां है,
या है मौसम का,
असर, दर्द तुमने,
दिया, अब तुम्हीं,
दवा कर!!
श्वेता कर्ण

2 टिप्पणियाँ