उस समय
जब माँ की गोद में बैठ कुछ 
हरफ सीखने थे मुझे
माँ के आँचल में छिपी मणियों में से कुछ मणियाँ संजोकर रखनी थीं 
अपनी झोली में छिपाकर
ताकि भविष्य में
सौंप सकूँ 
अपनी बेटी को वह संस्कार रुप में
उसके उज्ज्वल भविष्य के लिए
तभी बोलियाँ लग रहीं थीं
सौदा हो रहा था
इतना सस्ता सौदा 
शायद और कोई नहीं हो सकता था
वह सौदा था
किसी जिस्म का
जिस्म पर लगे गोश्त का
गुलाब से ओठों का
झील से गहरे शराब के प्यालों का
कितनी मिन्नतें कीं थीं
कितनी गिड़गिडा़यी थी वह
पर कौन
कौन सुनता
उसकी मिन्नतों को
भाई
बहन
पिता या 
वह माँ
जिसने नौ माह अपनी कोख में
छिपा कर रखा था
बड़ी ही शिद्दत से
इस नगीने को
शायद इसीलिए
ताकि यह नगीना उनकी
गरीबी के अभिशाप को धो सके
इसीलिए
नौ वर्ष की वह कली
किसी पचपन वर्षीय अधेड़ के सामने
एक एक पंखुड़ी बिखेरने को
बोटी  बोटी नौंची जाने को
डाली जा रही थी
कितने खुश थे सभी आज
उसी खुशी में
किसी की सिसकियाँ दबकर रह गयीं
लाल कफन में लपेट 
सोने चाँदी के आभूषणों से लाद दिया गया था
और
बैठाया गया जब डोली पर उसे
तब शरीर तो डोली पर था
मगर आत्मा मर चुकी थी 
उसके 
अनछुऐ कोमल सजीले सपनों के साथ
कहाँ था यह सब उसके उन सपनों में 
जो देखे थे उसने कभी खुली आँखों से
उसके सपनों में तो थे वह 
बासी रोटी नमक 
ठंडा पानी 
पैबन्द बाले कोमल वस्त्र
घास फूँस से बना एक प्यारा सा घरौंदा
पर यह क्या उसके मुँह में तो
सोने चाँदी के टुकड़े ठूँसे जा रहे थे
जो उसके 
तन और मन दोनों को ही
घायल करने के लिए काफी थे
उन नरपिशाचों में इंसानियत
ना बाबा ना
शायद यही नियति थी
उस नारी जीवन की।
                     देवयानी भारद्वाज
                 उसायनी फीरोजाबाद