महेशजी -(घर में घुसते ही) बेटा अनिल, सरला बेटी ,देखो तो कौन आया है!
अनिल और सरला - नमस्ते आंटी! आइये, हम आप ही का इंतजार कर रहे थे।
अरुंधति - (आश्चर्य से) हाँ, बेटा !
( अनिल और सरला अरुंधति के पैर छूकर आशीर्वाद लेते हैं।)
महेशजी - क्यों आश्चर्य हो रहा है? मैंनें कहा था न कि मैं बेटे और बहू से पूछूंगा। हमारे परिवार में हम सब घुल मिलकर रहते हैं ।  कोई समस्या हो तो सभी मिलकर हल निकालते हैं। कोई किसी बात को छुपाता नहीं। मेरा बेटा अनिल हाईकोर्ट में जज है और मेरी बहू सरला लेडी श्रीराम कालेज फॉर वुमन में अंग्रेजी की लेक्चरर है। पर घर में हम तीनों एक दूसरे के दोस्त हैं।
         (इतने में सरला आती है।)
सरला- आंटी , रात के साढ़े दस बज गये हैं, चलिये खाना खा लेते है।
महेशजी - सरला बेटी, उन्हें आंटी नहीं ,मम्मी कहो। वह तो अब तुम्हारी मम्मी है।
सरला - नहीं पापा ! अभी तो आपकी शादी करानी है ना! और हाँ आंटी आपकी शादी की शॉपिंग कब करनी है?
            ( सभी हँसते हैं।)
( फरीदाबाद का फार्महाउस रंगबिरंगी रोशनी में नहा रहा था। स्वागत द्वार पर "अरुंधति वेड्स महेश" लिखा हुआ था। सभी प्रतिष्ठित मेहमानों का आना - जाना लगा हुआ था।)
रमेश जी - यार, महेश! शादी मुबारक हो! तुमने जो कहा वह कर दिखाया। 
महेशजी - यार, तुम न होते  तो क्या यह संभव हो पाता? मुझे खुशी है कि मैं अरुंधति के लिये कुछ कर सका!
रमेशजी -( अरुंधति से) भाभीजी ,अब इजाजत दें और हाँ ,अगर मेरे लायक काम हो तो याद कर लीजिएगा, बंदा तुरंत हाजिर हो जायेगा।
अरुंधति- भैया, इस बहना को न भूलना।
( रमेशजी महेशजी से विदा लेकर निकल जाते हैं।)
(दूसरे दिन शाम को फार्महाउस के बगीचे में महेशजी और अरुंधति बैठे हुए बातें कर रहे है।)
अरुंधति -  यह शाम  कितना सुहाना है ! जी चाहता है यह पल कभी बीते नहीं।
महेशजी - हाँ अरुंधति जी!
अरुंधति - यह जी क्या लगा रखे हैं, सिर्फ अरुंधति कहिये।
महेशजी - ओह, मैं तो भूल ही गया कि तुम मेरी पत्नी हो । और हाँ, तुम भी यह जी क्या लगा रखे हो ,मुझे सिर्फ महेश कहकर बुलाओ।
अरुंधति - हाँ, महेश! यह शाम कितना सुहाना है । मैंने सपने में भी नहीं सोचा था कि मेरे जिंदगी में  फिर  बहार आयेगी। सोचा था कि मुझे घुटघुटकर मरना पड़ेगा।  पर आप जैसे देवता  मेरी जिंदगी में आये और अनिल जैसा बेटा और सरला जैसी बहू मिली । मैं तो धन्य हो गई! 
(अरुंधति महेशजी के गोद में सिर रखकर आसमान में चंदा और  तारे देखकर अत्यंत आनंद का अनुभव कर रही थी।)
महेश - अरुंधति! मनुष्य  के जीवन में कई पड़ाव आते है। उसे अनेक सुख दुख का अनुभव करते हुए अपनी जिंदगी में आगे बढंना पड़ता है। जिंदगी में उतार -चढाव देखते हुए जब वह उम्र के आखिरी पड़ाव की ओर बढ़ता है ,तब उसे शांति की जरूरत होती है। जीवन का एक बड़ा भाग वह अपनी जिम्मेदारियां निभाने मैं काट देता है। इस पड़ाव पर पहुंच कर उसे अपने लिए जीना है। 
  मैं पत्नी के बिना तन्हाई की जिंदगी जी रहा था। आप  बड़ी कष्टकर जीवन जी रहे थे।अब हम दोनों मिल गये तो यह जीवन खुशहाल हो गया।
हमारी जिंदगी की शाम सुहानी हो गई है।
,(कहीं से गाना सुनाई दे रहा था- " ये शाम मस्तानी मदहोश किये जाय ---")
अरुंधति - ( महेश के गोद में सिर रखकर सोई हुई)  हाँ महेश! हमारी जिंदगी की शाम कितनी सुहानी है!
                                (समाप्त)