• जगदीश 42 साल का पुरुष जो फाइनेंस कंपनी में काम करता है। उसके घर में उसकी पत्नी 
सुलेखा, बेटी छवि और बेटा रवि  करीब 11 साल का और उसे 2 साल बडी छवि।
• सुलेखा और जगदीश की शादी घरवालों की रजामंदी से तय हुई थी।सुलेखा के परिवार भी इसी
ही शहर में हैं। जगदीश के पिताजी छोटे भाई के साथ गांव में रहते हैं।
जगदीश को आज अपने दफ्तर की तरफ से बैंक का कर्जा ना देने पर नोटिस देने जाना था। वह 
अपने काम में बहुत व्यस्त रहता है। कई बार उसे शहर से बाहर दो-तीन दिन के लिए जाना पडता है।
रोजाना 9 से 5 की नौकरी करता है। शाम को वह घर जाता है ।शांत स्वभाव है जगदीश का, घर का 
माहौल कुछ ऐसा है तीन सदस्य और अपने - अपने फोन पर लगे होते हैं , पर संदेश भेज कर हंसते।
बीच-बीच में केवल यही सुनाई देता है -यह वाला अच्छा है ना उनकी हंसी को सुनकर वह भी
मुस्कुरा देता है। जगदीश को टीवी देखना पसंद है। अब पसंद ना भी हो तो भी क्या किया जा सकता 
है, वह घंटों न्यूज सुन सकता है लेकिन उसे सोशल मीडिया की लत नहीं। न्यूज़ सुनते- सुनते रात का 
खाना हो जाता है और सभी सो जाते हैं। सुलेखा उसकी मम्मी और उसकी भाभी सभी ने गुरु जी 
का नाम ले रखा है और वह अक्सर गुरुजी के आश्रम में जाया करती है घर में घंटों पूजा पाठ करती
है और जगदीश के अंडे खाना भी बंद करवा दिया है । यह है आजकल की व्यस्त, स्वस्थ और मध्यमवर्गीय 
हमारी कहानी के हीरो जगदीश की

• आज दफ्तर में जाते ही उसे नया के केस मिला।दस लाख का लोन कोई नहीं चुका रहा था, तो 
जगदीश को एक तरह उगाई का काम मिला। कारण पता लगाना सबसे पहला काम था सो 
वह सही पते पर पहुंच गया। उसने देखा काफी बडा मकान था, आंगन में बहुत सारे पेड -पौधे,ढेरों फूल
लगे थे।जिनमें से एक नीम का और दसूरा आम का बहुत ज्यादा बडे पेड थे, घर के सामने
का काफी हिस्सा जीन्होंने ढक लिया था । एक आदमी ने गेट खोला देखने पर साफ पता चल 
रहा था कि वह घर का नौकर था ।एक तरफ घास का लान और दसूरी तरफ फूलों के कई
प्रकार के पौधे , बीच की पगडंडि से होता हुआ वह बरामदे में पहुंचा नौकर आगे-आगे चल 
रहा था। उसी जगह बैत की बनी चार कुर्सियां और एक गोलमेज रखी थी नौकर ने बैठने का
इशारा 
किया और अंदर चला गया। कुछ ही देर में आया और जगदीश को अंदर आने के लिए
कहा ।जगदीश अंदर गया, एक बडा कमरा हरा कालीन बिछा हुआ, कुछ मनी पलांट के हरे पौधे
बडा ठंडा कमरा  था। जगदीश कमरे को देख ही रहा था तभी एक पीछे से आवाज आई 
‘आदाब बैठिए , आप खडे क्यों हैं। जगदीश के कानों में जैसे ही शब्द पडे उसने मुड कर देखा
जितने मीठे शब्द थे उतनी ही सुंदर एक महिला सूट सलवार सिर पर दपुट्टा था, मुस्कुराते
हुए हाथ का इशारा किया कुर्सी की तरफ, जगदीश सोफे पर बैठ गया। वह भी सामने आ 
बैठी कहने लगी कहिये क्या खातिर कर सकती हैं, 'हशमत' मेरा नौकर उसने बताया आप बैंक 
से आए हैं।
• जी ..जी अपने आपको थोडा संभालते हुए जगदीश ने कहा फाइल खोल कर देखने लगा तभी 
आवाज आई सलीमा। जी, जगदीश ने ऊपर देखा। मेरा नाम सलीमा है आप वही देख रहे हैं
फाइल में शायद ।जी हां, जी हां शब्द को दोहराते हुए जगदीश । जी मैं जानती हूंँ आप
लोग लोन चुकाने के लिए कहेंगे या फिर चेतावनी देने आए होंगे तभी नौकर पानी ले आया।
मैंने पानी एक साथ में पी लिया जैसे जन्मों का पयासा था। सलीमा ने कहा जाओ हशमत चाय नाश्ता 
ले आओ। मैंने कहा रहने दीजिए लेकिन जब तक नौकर जा चुका था। क्यों बैंक से आए हैं तो क्या
आप हमारे दशुमन हैं सलीमा ने मुस्कुराते हुए कहा। नहीं ऐसी तो बात नहीं।मैं कहने लगा। दोनों 
थोडा मुस्कुराते हैं। इस हल्की मुस्कुराहट में माहौल थोडा शांत कर दिया।। :- आपने काफी समय से 
बैंक को किस्त नहीं दी कारण बताएंगे ?आपको मालूम है इसका परिणाम क्या हो सकता है?आपको 
यह फॉर्मा भरना होगा सब कुछ मैं एक सांस में  कह गया प्रोफेशनल तरीके से और फॉर्मा देने 
के लिए सलीमा की तरफ हाथ बढाया; सलीमा दीवार पर लटकी पेंडुलम वाली घडी को घूर रही थी जो
उस वक्त 11:30 बजाने वाली थी। सलीमा ने भिगी आंखों से जगदीश की तरफ देखा और कहा 
वक्त की मार है साहब वरना कब का कर्जा उतार  दिया होता। जी जगदीश के मुंह से बस इतना ही
निकला । थोडी देर खामोशी रही। तभी नौकर ने चाय समोसे रखे और उस खामोशी  में सलीमा 
ने उठकर चाय जगदीश के हाथ में दी और समोसा भी दोनों ने चाय पी ली नाश्ता किया चाय पीते 
समय जगदीश ने सलीमा को एक नजर भर कर देखा वह कोई 27.या28 साल की जवान लडकी थी ।
उसका शरीर भरा भरा ,रंग एकदम गोरा, उसके बाएं गाल पर एक बडा सा तिल था जो बहुत खिल
रहा था वह देखने में बहुत आकर्षक है कोई भी एक बार देखे तो देखता रहे,बीच-बीच में कई बार 
दोनों की नजरें मिली दोनों हल्का सा मुस्कुरा देते, चाय खत्म हुई नौकर बर्तन भी उठा ले गया। 
जगदीश ने फिर से फाइल देते हुए कहा जी क्या कहना है? ओर सोच विचार करने लगा
मैं कई बार ऐसी जगह पर गया हूंँ पर जितना आज यहां अपने काम को लेकर सुस्त पड रहा हूंँ कभी
पहले इतना कमजोर नहीं पडा
यह जाने क्या कशिश है, यह खामोशी है जो मुझे बांध रही है।
बहुत कुछ बोलना चाहता हूंँ पर कुछ कह नहीं पा रहा
थोडी देर की चुपी के बाद एक गहरी सांस के साथ सलीमा ने बोलना शुरू किया दरअसल हम अभी 
बकैं का लोन नहीं दे पाएंगे। आप कुछ मोहल्लत दिला दीजिए आपकी मेहरबानी होगी। बहुत ही प्यार
व आग्रह से उसने यह शब्द कहे। जगदीश कुछ भी न कह सका। सलीम खडी हो गई जगदीश को हवा
के चलने जैसा एहसास हुआ। कोने में एक मेज थी जिस पर काफी सजावट का सामान करीने से सजा
था। सलीमा वहीं खडी थी, जगदीश भी उठा और ठीक उसके सामने खडा हो गया, वह क्यों उठा? नहीं जानता अपने आप खिंचता गया उसकी ओर
दोनों की निगाहों ने सवाल जवाब की, जुबान का कोई काम नहीं था। ईमान है थोडी देर बाद का
सलीमा ने कहा- हमने अपनी अम्मी की बीमारी के इलाज़ और अपनी पढाई के लिए लोन लिया 
था। मगर हमारी अम्मी को गले का कैं सर निकल आया और सारा पैसा खर्चा करके भी हम उनको ना 
बचा सके। 6 महीने पहले उनका इंतकाल हो गया। फिर से खामोशी छा गई। कुछ देर में चुप्पी तोडते
हुए जगदीश ने पूछा और पापा या अब्बा ,??मेरे वालिद का तो 2 साल पहले ही इंतकाल हो गया था ।
मैं इन दोनों की इकलौती संतान हूंँ मगर वालिद के दो बच्चे और भी हैं मतलब जगदीश ने
उत्सुकता से पूछा,
 सलीमा ने गहरी सांस ली और कहा चलो सारा किस्सा कह देती हूंँ ना जाने क्यों 
अपने से लगे आप बता देती हूंँ।
सलीमा का यूं अपनापन दिखाना मुझे भीतर तक छू गया। वह अपनी जिंदगी लगी😍
मेरी अम्मी अब्बू ने अपनी मर्जी से निकाह  किया था। मेरी अम्मी अब्बू 4 साल ही साथ रह पाए थे।
मैं 3 बरस की थी तो अब्बू को किसी ओर से इश्क हो गया और उन्होंने अम्मी से कहा मैं दसूरी
शादी करूंगा अम्मी भडक उठी ,ऊंची आवाज में बात करने लगी अब्बू को भी गुस्सा आया और उनके
मुंह से वह तीन नापाक, नापाक शब्द निकल ग ए फिर खामोशी छा गई। जगदीश ने 
पूछा क्या करते थे वे?
जी क्लर्क थे  और अम्मी ने मेरा पालन पोषण किया है एक 
कं पनी नौकरी की,हमारे अबूशायरी भी करते थे।
 तब तो आप भी शायरी करती होंगी जगदीश ने बात 
बदलने के लिए पूछा,
 जी नहीं, नफरत है मुझे, थोडा सोचते हुए -वैसे सच कहूं तो पूरी तरह नफरत भी
नहीं कर पाती हूंँ जी चाहता है शायरी पढूं, लिखूूँ, लेकिन फिर अपने आप को रोक लेती हूंँ। 
क्यों ?
जगदीश ने उत्सुकता से पूछा 
क्योंकि अब्बू ने जिन से दसूरा निकाह किया वह भी शायरी लिखती हैं।
मुझे ऐसा लगता है कि शायरी के कारण ही मेरे अब्बू मुझसे दूर चले गए। कुछ देर कमरे में सन्नाटा
पसर गया। पंखे और पेंिुलम घडी की आवाज आ रही थी । चुप्पी तोडते हुए जगदीश बोला जी 
मैं कल यह फाइल लेने आऊं भरकर तैयार रखना और इतना कहकर मैं तेज तेज कदमों से बाहर आ 
गया मुझे समझ नहीं आ रहा था क्यों बाहर गया,उसने तो नहीं कहा, शायद उसका दुख न देख सका।
मगर उसके दिलो-दिमाग से सलीमा निकल नहीं रही थी। यूं तो जगदीश ने कभी किसी औरत में 
दिलचस्पी नहीं दिखाई थी कई खूबसूरत औरतों से वह मिला है मगर जो असर सलीमा ने उसके दिल
पर किया उसका हाल बेहाल था उसे ऐसा लग रहा था मानो यह उसका पहला प्यार है घर आकर 
न्यूज़ चलाई रोज की तरह मगर सलीमा का चेहरा उसकी आवाज उसे सुनाई दे रही थी रात को
सोते वक्त बार-बार सलीमा के जिस्म की उसे याद आ रही थी । करवट बदल रहा था सलीमा का 
चेहरा दिख रहा था का चेहरा उसे याद आ रहा था।
वह करवटें बदलता रहा। सुबह उठकर तैयार हुआ जल्दी से दफ्तर पहुंचा और वह बेकरार था सलीमा 
के घर जाने के लिए अब आए दिन  दोनों मिलने लगे बातें होने लगी। सलीमा को भी जगदीश का 
साथ भाने लगा और वह शायरी से दूर भाग रही थी उस शायरी में डूबती चली गई। दोनों का इश्क 
परवान चढा, सलीमा और जगदीश अब उनके बीच में ऐसा प्रदा न रहा था कि उनको एक दसूरे को
बताना पडे कि वह दसूरे से प्रेम करते हैं एक दसूरे के प्रेम में है ।सलीमा के दस लाख लोन को
घोटाला करके जगदीश सेटल कर दिया  और सलीमा को ओर दस लाख दिलावाने की कोशिश शुरू हुई।
,जगदीश सातवें आसमान पर था उसे लग रहा था कि दुनिया की सारी खुशियां उसके कदमों में और 
वह सातवें आसमान पर है।सलीमा के घर में उसका आना जाना  शुरू हो गया। जगदीश इस 
वक्त सलीमा के इश्क में था। उसे कुछ और दिखाई नहीं दे रहा था। सही गलत का उसे भान न था। वह 
तो प्रेम में सब जायज है इसी बात पर टिका था। सही कहा है किसी ने कि प्रेम अंधा होता है और 
सही गलत का अंतर भी भुला देता हैं। यदि प्रेम सच्चा हो तो सही राह दिखा देता है। जगदीश कई 
जगह पूछ चुका था ₹1000000 कहीं से उसे उधार मिल जाती है। हर हाल में सलीमा की मदद करना 
चाहता था। जगदीश के भाई और पिताजी गांव से घर आ गए और कई दिनों तक वह ऑफिस के 
काम में उलझा रहा।
सलीमा से कोई बात नहीं हुई थी उसे शर्म आ रही थी कि मैं सलीमा के सामने के से जाऊं  मैं 
उसकी कोई मदद नहीं कर पा रहा। कहीं बुरा ना माने, उसका दिल ना टूट जाए कहीं वह है ना 
सोचे कि मेरी वजह से जगदीश को इतनी मुसीबत झेलनी पड रही है ।और ख्याली पुलाव में दुखी
जगदीश 2 हफ्ते बाद एक दिन सीधे सलीमा के घर जा पहुंचा जहां नौकर ने दरवाजा खोला और
बरामदे में उसने सलीमा के साथ किसी को हंसते, बैठते ,बोलते पाया तो उसने पूछा  यह कौन है ?
सलीमा ने कहा मेरा कजन है ।अब उदास जगदीश सलीमा को कुछ बता भी नहीं सकता। वह फिर
वापस आ गया। सलीमा ने पूछा भी आपकी तबीयत तो ठीक है? जगदीश ने कहा मैं बहुत बीमार था,
और कई दिनों तक नहीं मिल पाऊं गा,ये कह चल दिया, मैंने कहा आप अपना ध्यान रखिएगा और 
मुस्कुराते वह बोली, विदा ली घर आने के बाद जगदीश को तरह तरह के ख्याल आने लगी उसका 
दिमाग सलीमा पर शक कर रहा था किसके साथ बैठी थी? क्यों हंस रही थी? दिल गवाही देता क्यों 
क्या हुआ है?अरे! उसका रिश्तेदार था । कुछ दिन की जुदाई ने जगदीश का हाल बदल दिया ।
सुलेखा भी सवाल पूछती तो वह टाल देता। एक दिन रविवार को सुलेखा बच्चों के साथ मायके
गई। जगदीश की भी छुट्टी थी  वह अपने टूटे दिल और टूटे हालात के टुकडे लिए सलीमा के घर
की तरफ इस उम्मीद में बढ चला कि आज वह सिमट जाएगा उसकी बाहों में सब से तोड लेगा नाता कह 
देगा कि चलो एक हो जाते हैं। विवाह के बंधन में बंध जाते हैं और इसी तरह के हसीन सपने लेकर 
वह सलीमा की घर की तरफ बढा
आज सलीमा के घर में रौनक की थी घर सजा हुआ मेहमान जुटे हुए जगदीश में अपने कपडे बाल 
ठीक किए और एक गहरी सांस लेकर घर के अंदर घुसा हशमत को इशारे से बुलाया पूछा क्या है
जन्म दिवस है कोई पार्टी है हशमत ने कहा नहीं ,निकाह हो गया है। किसका जगदीश ने से पूछा
हसमत ने खुश होकर कहां अपनी सलीमा जी का,मेहर में पूरे दस लाख  मिले हैं। दसलखा सुन वह
 मुसकराते हुए उसने खुद को टूटा हुआ महसुस किया,जगदीश पर तो मानो पहाड टूट पडा, उससे
पूछा ही ना गया  किसके साथ? टूटे- टूटे कदमों से ही आगे बढा ,उसके कानों में एक ही आवाज ...
गूंजी...मेहर के दस लाख, बस इतना सुनते ही जगदीश सलीमा के घर एक पल न ठहर पाया।
और उसके कानों में बार-बार दस लाख गुंजता रहा...


वंदना शर्मा✒️