देवपुरी नगरी ,वहां के राजा सत्य वक्ता अपने प्रजा का रक्षा करने वाले बहुत ही तेजवान थे।
संतान न होने के कारण चिंताग्रस्त रहते थे
शिव उपासना में तल्लीन संतान कामना से बहुत सारे यज्ञ होम जप भी किए।
सारे तीर्थ स्थान जाकर माथा टेकते रहे।
गंगा नदी के तट पर जाकर  
स्नान ध्यान पूजन करते हुए  ध्यान करते हैं। मां गंगे हमें संतान प्राप्ति हो तो हम आपके ही चरणों में अपने पुत्र का मुंडन करवाएंगे।
मां गंगे प्रसन्न हो गई और उन्हें संतान प्राप्ति का वरदान दे दिया।
एक वर्ष बाद उनके यहां सुंदर राजकुमार ने जन्म लिया।
अनुपम छटा तेजवान  रूपवान सब को मोहित करने वाले बहुत ही सुंदर गंधर्व देखते ही मन लालायित हो जाए।
इतने सुंदर पुत्र को पाकर राजा सब कुछ भूल गए और पुत्र के लालन-पालन में खुशियां मनाने लगे नगर नगर में उन्होंने संदेशा भेज दिया और उत्सव सालों साल मनाते रहे।
इस बीच रानी ने अनेकों बार उन्हें याद दिलाया कि आपने मां गंगा से प्रार्थना किया था कि आप उनके चरणों में अपने लाल का मुंडन करवाएंगे। तो चलिए पहले मां गंगा के चरणो में अपने लाल का मुंडन करवाते हैं।
पर खुशियों के बस उन्होंने कहा अभी तो बहुत समय है जब हमारे राजकुमार का विवाह होगा उस समय जाकर मां गंगा के चरणो में मुंडन करवाएंगे।
इतने सारे अतिथि हमारे दरबार में आए हैं। उन सब को छोड़कर हम  जाएंगे तो इन लोग को बहुत बुरा लगेगा।
इस वचन को सुनकर रानी चुप हो गई।
बार-बार रानी याद दिलाती राजा कुछ ना कुछ परेशानियां बताकर रानी को हमेशा ही चुप करा देते 
फिर  रानी ने कहना छोड़ दिया और भूल गई।
राजकुमार जब 16 वर्ष के हुए नगर नगर से उनके लिए विवाह प्रस्ताव आने लगे।

रूपवती गुणवती तेजमयी हर कला में निपुण राजकुमारी श्रुति से उनका विवाह संपन्न हुआ।
विवाह के दौरान भी राजा ने मां गंगा के तट पर जब जाकर मुंडन नहीं करवाया तो मां गंगा क्रोधित हो गई। कॉल रूप धारी नागीन का वेश धरकर मां गंगा शादी के दूसरे दिन ही आकर राजकुमार को डस लेती हैं।
पूरे राजमहल में कोहराम मच गया पूरा राज्य शोकाकुल हो गया।
सारे नगरवासी सहित राजा और रानी भी राजकुमारी श्रुति को इसका कारण बताकर  उनके साथ अत्याचार करने लगे।
उन लोगों का मानना था कि राजकुमारी श्रुति के अशुभ कदम जैसे ही राज परिवार में पड़ा ।
राज्य कुल का दीपक बुझ गया।
रोज-रोज अत्याचार करके भी जब राजा रानी के मन में संतोष नहीं हुआ। तो उन्होंने राजकुमारी श्रुति को महल से बाहर निकाल दिया।
बहुत ही दयनीय हालत हो गई राजकुमारी श्रुति की और वह पागलों जैसी विक्षिप्त दिखने लगी आंसू जैसे उनकी आंखों से सुखी गई थी।
चलते-चलते गंगा नदी के तट पर पहुंची।
गंगा में प्रवेश कर अपना प्राण त्यागना चाहती थी।
पर मां गंगा उन्हें हमेशा ही नदी के तट पर धकेल देती हैं और उन्हें अपने अंदर समाहित नहीं कर रही थी। 
राजकुमारी श्रुति  गंगा के तट पर बैठ गई।
भूख प्यास से उसने अपना नाता तोड़ लिया  
पत्थर की प्रतिमा में तब्दील हो गई।
आत्मा सहस्त्र देवी देवताओं को पुकारने लगी।
यह कैसा न्याय है जो आप हमारे साथ कर रहे हैं। जिसके साथ जिंदगी बिताने के लिए हमारे पिता ने हमें भेज दिया ।उन्होंने तो हमारा साथ छोड़ दिया। उनके परिजन भी हमें महल से बाहर निकाल दिए। कुछ भी उपाय ना होने पर हम जब  मृत्यु के शरण में गए तो मां गंगा भी हमें अपने अंदर प्रवेश नहीं करने दे रहीं क्या मैं इतनी अपवित्र हो गई।
कुछ दिनों बाद वहां पर डोम डोमीन आई।
संस्कार करके जाते हुए किसी ब्राह्मण के वस्त्र लेने।
जब उसने वहां देखा  पत्थर प्रतिमा बनी किसी की सांस चल रही है।
सांसे तो चल रहे हैं ,और बाकी हाथ पैर कहीं भी कोई हलचल ही नहीं है।उसे बहुत ही आश्चर्य हुआ।
मां गंगा से जल लेकर  उसने  प्रतिमा पर छिड़क दिया।
मां गंगा के पवित्र जल से  प्रतिमा को होश आ जाती है।
फिर उसने पूछा कि तुम कौन हो और यहां क्या कर रही हो क्या किसी तपस्या में बैठी थी क्या हमने  तुम्हारी तपस्या में  विघ्न तो नहीं डाला ?
तत्पश्चात रानी ने अपने सारे आपबीती उस डोमिन को बता दिया।
प्रतिमा को जल छिड़क के उसने उसे होश में लाया था इसलिए डोमिन ने उसका नाम प्रतिमा रख दिया।
और कहा कि आज से तुम्हारा दूसरा जन्म  हुआ है आज से तुम हमारी बेटी बनकर हमारे घर में रहोगी
यहां राजकुमार की आत्मा को भी शांति नहीं मिली
वो भी मां गंगा के तट पर आकर मां गंगा से विनती करने लगा।
हे मां गंगा हमारे माता पिता परिजन और धर्मपत्नी
हमारे मौत के कारण घोर कष्ट उठा रहे।
कुछ समय बाद प्रतिमा को आभास हुआ कि वह गर्भवती है।
उसने जब अपनी मां डोमिन को यह बताया।
वह बहुत ही खुश हो गई।
प्रतिमा ,नित्य दिन मां गंगा के तट पर आती और पूजा अर्चना करती।
वहीं पर उसका पति आत्मा के रूप में उसे हर पल निहारते रहता ।
कुछ समय बाद उसे आभास हुआ कि प्रतिमा गर्भवती है।
उसे जीने की लालसा उत्पन्न हो गई।
उसने कहा मां गंगा कुछ ऐसा करो कि हम जी सके  आखिर हमने ऐसा क्या पाप किया है कि आप  हमें हमारे पुत्र स्नेह से वंचित कर रहे हैं।
बहुत दिनों से आत्मा द्वारा सुन रहे द्रविड़ वचन और प्रतिमा के पूजा अर्चना से प्रसन्न होकर मां गंगा ने कहा सुनो, तुम्हारी या प्रतिमा की कोई गलती नहीं।  तुम्हारे जन्म से पहले तुम्हारे माता-पिता हमारे तट पर आकर हमसे वचनबद्ध हुए थे ,  तुम्हारे जन्म के उपरांत तुम्हारा मुंडन संस्कार हमारे ही चरणों में करने का वचन दिया था पर तुम्हारे जन्म के बाद तुम्हारे आने की खुशी में वह हमें भूल कर अपना वचन नहीं निभाए।
शादी के समय भी जब उन्होंने अपना वचन नहीं निभाया तो हमें क्रोध आ गया।
और हमने  नागिन रूप धर कर तुम्हें डस लिया।
कुछ समय बाद प्रतिमा को प्रसव पीड़ा आरंभ हुई।
उस समय मां गंगा ने उसे दर्शन दिया और कहा कि तुम अपने ससुराल  जाओ भिखारी का रूप धरकर।
मां गंगा के आशीर्वाद से वह वहां गई प्रसव पीड़ा से व्याकुल हो चिल्लाने लगी। सारे दरबारी एकत्रित हो गए ।स्त्री जब सामने आकर उन्हें प्रसव करवाने की कोशिश करने लगी।
तब प्रतिमा ने कहा जिस  महल में यहां का राजकुमार जन्म लिया था उसी कमरे में हम भी अपनी संतान को जन्म देंगे।
प्रसव पीड़ा से व्याकुल प्रतिमा को देखकर राजा ने हामी भर दी।
कुछ समय बाद बहुत ही सुंदर तेजवान रूपवान बालक ने जन्म लिया।बालक को देख कर राजा रानी को अपना पुत्र स्मरण हो आया यह तो बिल्कुल ही उनके पुत्र के जैसा ही है।
उस बालक से मोह हो गया और उन्होंने कहा कि तुम यहीं रह जाओ।
आत्मा के रूप में बालक के पिता रोज ही रात्रि 12:00 बजे अपने पुत्र से मिलने आते और सूरज उगने से पहले ही चले जाते।
कुछ नगरवासी ब्रह्म मुहूर्त में उठकर गंगा स्नान को जाते।
आते जाते समय बहुत बार उन्होंने देखा कि राजमहल से कोई पुरुष ब्रह्ममुहूर्त में उठकर बाहर जाता है। यह बातें उन्होंने राजा से बतायी।
कहा भिखारिन से मिलने पुरुष रात्रि में आता है और सुबह ब्रह्म मुहूर्त में ही चला जाता है।
राजा रानी ने जब पूछा तो भिखारीन ने मना कर दिया।
फिर रानी भिखारिन के साथ ही उसके कमरे में सोने चली गई।
आंचल से मुंह ढककर पलंग पर लेट गई।
रात्रि 12:00 बजे उसका पुत्र आया उसने देखा यह तो उसका पुत्र है। देख कर व्याकुल हो गई ।उसने कहा तुम तो मेरा ही पुत्र है ।
भिखारिन से तुम्हारा क्या रिश्ता है।
और जब आता ही है तो हम लोगों से मिले बिना कैसे चला जाता है क्या तुम्हें हम लोगों के ऊपर जरा भी  दया नहीं आती?  तब  पुत्र ने कहा यह भिखारीन नहीं तुम्हारी  बहू है जिसे तुमने हमारे मृत्यु उपरांत महल से बाहर निकाल दिया था।
जो तुम लोगों ने बचन किया था। उसे नहीं निभाया तुम्हारे वचन तोड़ने की वजह से हम मृत्यु को प्राप्त हुए।
और तुम्हारी बहू घोर कष्ट सहकर भिखारिन बनी।
अपने पुत्र के मुख से यह वचन सुनकर रानी को मां गंगा से किया हुआ वचन याद आ गया।
उसने कहा हमसे अपराध हुआ है।  हमने अपना वचन नहींं निभाया। अब इसको सुधारे कैसे यह बताओ।
फिर उसने कहा कि तुम अपने पौत्र का मुंडन संस्कार मां गंगा के तट पर करो वहां पर सारी देवी देवता सहित भूत प्रेत पक्षी सब को आमंत्रित करना।
रानी ने वैसा ही किया।
राजा ने जगह-जगह घोषणा करवा दी कि हमारे पौत्र का मुंडन गंगा नदी के किनारे हो रहा है आप सब आमंत्रित हैं।साथ ही देवी देवता भूत प्रेत जितने भी जीव जंतु थे इस संसार में सारे जीव को आमंत्रित कर उसने मन ही मन निवेदन किया कि आप सब हमारे पौत्र के मुंडन संस्कार में आकर उसे अपना आशीर्वाद प्रदान करें।
निश्चित तिथि पर मुंडन संस्कार आरंभ हुआ गंगा नदी के किनारे। जितने भी देवी देवता थे सारे ही  वहां उपस्थित हो गए कुछ ऋषि बनकर कुछ  भिक्षुक बनकर तो कुछ साधारण इंसान बनकर। आत्मा रूप में वहां बालक का पिता भी आ गया।
महादेव ऋषि के वेश में वहां उपस्थित हुए।
संजोग बस उसी ऋषि को रानी ने अपने पुत्र के मुंडन संस्कार के लिए पंडित के स्थान पर आमंत्रित किया।
मुंडन संस्कार  आरंभ हुआ। बच्चा जोर जोर से रोने लगा सारे देवी देवता हैं उन्हें चुप कराने में विफल साबित हुए सारे भूत प्रेत नाचने लगे ढ़ोल मृदंग बजाने लगे। ताकि बच्चे आकर्षित हो चुप हो जाए पर सारे ही विफल हुए।
फिर बालक के दादी ने कहा हमारे यहां का रिवाज है मुंडन के समय पिता अपने गोद में लेकर बच्चों का मुंडन संस्कार करवाता है इसीलिए हमारा पौत्र इतना रो रहा है।
अब हम इस नन्हे से जान को कैसे समझाएं इसका पिता इसे छोड़कर इसके जन्म से पहले ही स्वर्ग लोक में जा चुका है।
इतने देर से वहां बैठे सारे देवी देवता जो बच्चे को चुप कराने में विफल हो चुके थे जब उन्हें बच्चे के रोने की वजह पता चली तो उन्होंने सारे देवता ने मिलकर विचार किया और कहा ।चुकी राजा के वचन भंग के वजह से मां गंगा कुपित होकर नागिन के रूप में बच्चे के पिता को डस लिया। इस वजह से पुत्र को पिता के विछोह का कष्ट देना सही नहीं है फिर सारे देवी देवताओं ने विचार-विमर्श करके महादेव से आग्रह किया महादेव ने कमंडल से जल लेकर वहां सारे पूजा सामग्रियों में रखे हुए नारियल पर छिड़क दिया और वहां आत्मा रुप में बैठे हुए बालक के पिता उस नारियल में समाहित हो गए। और सुंदर राजकुमार में परिवर्तित हो गए। इस प्रकार बच्चे को उसका पिता मिल गया और मां को पुत्र। इससे एक बात तो साबित हो गई  वचन भंग तो राजा ने किया था। राजा के वचन भंग के कारण उनके बेटे की मृत्यु हो गई और उनके बेटे की मृत्यु की वजह से उनकी बहू को घोर कष्ट झेलना पड़ा इसलिए कभी वचन ना ले और अगर वचन ले तो अवश्य निभाएं।

                           अम्बिका झा ✍️

कहानी पूर्ण रूप से काल्पनिक है।
गलती पर मार्ग दर्शन करें।