क्या लिखूँ मै तुझपर"
ये स्त्री,!
मनु की सत्तरूपा लिख डालूँ.
या किंचितं अभिलाषा लिखूँ।
गौरव मय इतिहास लिखूँ अब,
तू ही बता ये स्त्री,।
त्याग लिखूँ सीता सा,या प्रेम,
लिखूँ ,राधा सा,या परकाष्ठा।
मीरा जैसी ,या विरह लिखूँ,खुद
के जैसा..अब तू ही बता ये स्त्री।
वत्सल्य लिखूँ अनसूइयां सा,
त्रिदेव पुत्र बन भाग्य जगे!
या दोष लिखूँ,आहिल्या सा"
जिससे देवेश ने छल किया,।
अब तू ही बता ये स्त्री,
युग युग बीते.तू न बदली!
न बदला ,सँसार नियम,
एक स्त्री बन निर्माण किया!
मर्यादा का जकडे बंधन,
अब तू ही बता ये स्त्री!
हर रुप मे ,विभक्त हुई"
हर रूप तेरा रस का प्याला!
अविरल ,ममता की नदियां,
बहती जिसमे जल की धार।
अब तू ही बता ये स्त्री,
अपने बच्चों की ममता !
पति की भोग्या,पतिव्रता,
सारे शब्द हुऐ,फीके अब।
अब तू ही बता ये स्त्री,
अब तू ही बता ये स्त्री।।
रीमा ठाकुर(लेखिका)
रानापुर झाबुआ मध्यप्रदेश

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