एक ज़िंदगी , अनगिनत उदासियां ,
पग पग पर बेबसी करती अठखेलियां 
निकलने इनसे करती कई कोशिशें ,
बांध कर रखती,मुझे मेरी मजबूरियां !!!!!!

कुछ तो बैर था अपनी ही हसरतों से,
कुछ तो चुभ रहा था, अपनी ही उम्मीदों से ,
थमा दिया जो दामन ,खेलने को उसे,
और वो गिनता रहा,मुझे मेरी ही गलतियां !!!!!!

डूबने की उम्मीद से , उतरी थी समंदर में ,
अनमोल मोती कई मिले ,उस खारे पानी में,
रुक ना पाई ,तलछटी में ठहर कर ,
फिर किनारे तक लें आई मुझे मेरी ही कश्तियां !!!!

कीमतों के इस शहर में ,बिक ना पाई ख्वाहिशें ,
दर बदर हुआ ठिकाना, लगती रही बोलियां,
सब्र देखा दुनिया ने ,चलती रही छुरियां ,
बेजुवानी की नहीं, मौन की ये सिसकियां !!!!!

झूठ पसरा साथ में,हाथ में है रिक्कतियां,
द्वेष, मन, भाव की जल रही होलियां,
लोप हुआ प्रेम ,प्यार ,जीवन की रंगीनियां
ठंडी होती राख में,फूंक रहे चिंगारियां !!!!!

छुप गई थी धूप जैसे, छा रहीं थी बदलियां ,
ढूंढ कर लाई, मुझे मेरी ही सहेलियां ,
शब्द शब्द पीर लिखी, लिख ना पाई मस्तियां ,
रह रह कर छलती रही, मुझे मेरी ही नादानियां !!!!!!!



                कीर्ति चौरसिया
             जबलपुर (मध्य प्रदेश)