मौन हूं
पर अनभिज्ञ नहीं
मैंने देखा है बहुत करीब से
जज़्बातों की बारात में
जहां तहां
अकेले भटकते नेह को
जैसे सावन से झुलसते मेह को
फुहारों की चाह हो
परन्तु 
मेह को झुलसाया
किसने 
आपने 
मैंने या किसी और ने
नहीं नहीं
मेह को झुलसाने बाला भी मेह ही तो था
अब झुलसता मेह
जलन के अलावा
दे भी क्या सकता है
आज देखा मैंने
उन बेहद खूबसूरत गलियों की दीवारों को
नजदीक से
बहुत करीब से
दरकने लगीं हैं अब
लोना जो लग गया है उनमें
उस छोटे से जर्जर घर की छत 
आज भी याद है मुझे
जिसकी टपकन
और नजदीक ले आती थी
उस घर के लोगों को
मगर आज के आलीशान मकान में
मनुष्य कम 
दीवारें ज्यादा हैं
अचानक यादों के संदूक से
वह पुरानी लिहाफ क्या निकली
खुशियों की बारात ही आ गई
हाड़ कंपाती सर्दी में
एक रजाई में ही 
सभी भाई-बहनों का एक साथ छिपकर सो जाना
एक दूसरे के साथ खाने की ज़िद 
भैया के कपड़ों के छोटे होने का बेसब्री से इंतजार 
स्वप्न जैसी बात ही तो है अब
मगर आज
तौलिया भी अलग-अलग हैं
बदबू जो आती है 
हां यही बदबू तो है
जो आज बस गई है रिश्तों में
तुम भी अनभिज्ञ कहां हो
इस हकीकत से
पर हां
मौन जरुर हो
नियति पर
शायद मेरी ही तरह।

                     देवयानी भारद्वाज
                 उसायनी फीरोजाबाद