मरुस्थल सी यह जिंदगी 
फिसल रही है रोज रेत सी
खुशियों में सोने की चमक 
चढ़ते सूरज में सोने के रेत सी 
संध्या ढलीठंडक दे जाते 
लोगों के मिलन से आत्मा शीतल कर जाती 
 कभी मिलन ,
 कभी विरहा
 कभी यादों के साए में गुम होते लोग
  धीरे-धीरे आगे बढ़ती यह जिंदगी 
  रोज रेत सी फिसल रही है जिंदगी।।
                    दिल की कलम से


                    मधु अरोड़ा

                    
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