उस छोटी सी उम्र की ज़िद,
जन्मदायिनी मां के आंचल की छांव  पाने की ज़िद।
तोतली आवाज में मां को "मां"पुकारने की ज़िद।
नन्हें नन्हें पैरों से चलने की ज़िद।
गिरकर उठते हुए संभलने की ज़िद।
छोटी उंगलियों से सुंदर लिखने की ज़िद।
पेंसिल से कलम तक की ज़िद।
आंखों में सपने देखने की ज़िद।
खुद की पहचान बनाने की ज़िद।
मां-बाबा के बुढ़ापे का सहारा बनने की ज़िद।
अपने अरमानों को पूरा करने की ज़िद।
पक्षियों की तरह आसमान में उड़ने की ज़िद।
अबोध बालक की तरह चांद को पाने की ज़िद।
एक पल में परायों को भी अपना बनाने की ज़िद।
उनके होठों को मुस्कान बन जाने की ज़िद।
इस नफ़रत से भरी दुनिया में,
प्यार के दीप जलाने की ज़िद।
पल, पल जीवन में आगे बढ़ने की ज़िद।
बचपन की सुनहरी यादों को 
संजो कर रखने की ज़िद।
ये मेरी ज़िद्दी ज़िद ही तो है,
जो मुझे हर रोज एक नए संघर्ष का सामना करने के लिए तैयार करती है।

अर्चना पाण्डेय "आर्ची "
गोरखपुर