सिमट सिमट, हिय पर लगी, 
कंपकपात सी,सोई रही वो, 
किटकिटाय, थरथर रद सो, 
ऐ! सखि साजन..?न सखि शिशिर ।

रजनी में तो, आवे नाहीं, 
भुंसारो में, होय त जावे, 
बड़ो अनोखो, उसको आनन, 
ऐ! सखि साजन..? न सखि चाँद ।

हरदम देखत, रहत जिनको, 
भरत रहत हे, इनमें सागर, 
देखन को हम, तरसत हरदम, 
ऐ! सखि साजन..? न सखि अश्रु ।

मन में बदरा, छा गये सखि, 
निस दिन ही, तरसत रहत, 
हिय में बड़ो, प्यारो लागे, 
ऐ! सखि साजन..? न सखि वर्षा ।

    काव्य रचना-रजनी कटारे 
          जबलपुर (म. प्र.)