औरत कहां किसी पुरुष से हारती है
औरत तो बस औरत ही हार मानती है ।
जब जब किसी औरत पर कोई समस्या आती है,
तो औरत ही उसे औरत के विरुद्ध उठ जाती है ।
कभी मां बनकर बहू का त्याग करवाती है,
और विरोधी बेटे के साथ खड़ी हो जाती है।
कभी बहन बनकर भाभी पर लांछन लगाती है
और भाई के सहयोगी बन जाती है ।
कभी प्रेमिका बनकर प्रेमी को गले लगाती है,
और उसकी भारिया की दुखद पीड़ा की वजह बन जाती है
कभी पत्नी बन पति के गलत होने पर भी ,मेरा धर्म है पति का साथनिभाना पति के हर गलत में शहगामिनी बन जाती है।
औरत ही है जो औरत को कमजोर बनाती है ,
यकीन ना हो तो इतिहास उठाकर देख लो औरत ने जो भी सहा है कहीं ना कहीं और थी उसकी वजह है होती है।
इसीलिए नवदुर्गा से संगठित शक्ति धार लो एक दूसरों की समस्याओं को संगठित हो सहार दो फिर देखो जिंदगी किस कदर मुस्कुराती है।
जब औरत क्रोधित होती है तो बड़े-बड़े शिव के चरणों में धारती है बस औरत ही तो वह है जो औरतों की कमजोरी बन जाती है
कभी किसी पुरुष का इतना साहस नहीं जो वह स्त्री पर शासनकर सके, प्रेम में डूबी हुई वह खुद ही उसके समक्ष समर्पित हो जाती है।
क्योंकि वह रिश्ते को टूटने से ज्यादा बनाने में यकीन रखती है,
तुम कभी न हारो के8सी भी मोड़ पर तुम्हारा हाथ नही छोड़ती है।
औरत है वह पर कितनी दुखद पीड़ा स्पद बात है औरत को नहीं समझती है ,
औरत होकर औरत को समझना सीखो उसके मन के भावों को पढ़ना सीखो पढ़ तो लेती हो तुम ,क्योंकि तुम भी तो एक औरत हूं पढ़कर उस का साथ देना सीखो तब देखो औरत जमीन से लेकर आसमान तक क्या धूम मचाती है जिस दिन एक औरत दूसरी औरत को समझ जाती है औरत की सारी पीड़ा मिट जाएगी।
अंजू दीक्षित,
बदायूँ,उत्तर प्रदेश।

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