जन्म लेकर मां की कोख से
बेटी बनी बहना बनी
महका कर बाबूल का घर अंगना
एक दिन वह ससुराल चली
रूकने का भी ना कोई बहाना था
त्याग ममता दया करूणा प्रेम की मूरत को
एक नहीं दो दो घरों को सजाना था।
सर्वस्व न्यौछावर कर प्रेम प्यार खुशियां वह लुटाती रही
अक्सर दर्द को अपने अपनी पलकों के पिछे छिपाती रही
जब भी विचरना चाहा स्वछंद नीलगगन में
अपनों ने ही कैद कर दिया 
यह कहकर तुम स्त्री हो तुम्हें उड़ने की इजाजत नहीं
कब तक कैद रहती भला 
कब तक दर्द सहती भला
हूंकार भरी कहने लगी ना कहो मुझे 
अबला जीवन हाय तुम्हारी यही कहानी
आंचल मैं दुध आंखों मैं पानी।।
जो रहती थी कभी बंद चार दिवारी में
आज पुरुष से कंधे से कंधा मिलाकर नहीं 
चार कदम और आगे बढ़ने लगी
जो देखे थे कभी बंद आंखों से सपने 
आज हर स्त्री अपना सपना खुली आंखों से पूरा करने लगी
ऐसा नहीं है उसने अपनों के लिए जीना छोड़ दिया
बस अब थोड़ा सा वह अपने लिए भी जीने लगी
हां पिंटू अपने लिए भी जीने लगी।।

नारी निंदा ना करें नारी गुण की खान।
नारी से नर उपजे ध्रुव प्रहलाद समान।।
इस दोहे के रचयिता महान कवि और हर नारी को मेरा कोटि कोटि प्रणाम 🙏



पिंटू कुमावत'श्याम दिवाना'🙏🙏💐💐