छोटी सी मैं आम का पौधा,
आकर उसने 'रोप' दिया...
बाँहें फैलाने की थी बारी,
टहनियों में जब,फल लगा...
छोटी सी मैं.....
 

   बारिश की रिमझिम वर्षा में,
   जंगल भी हरियाली हुई...
   खुशबू से तन झूम रहा अब,
   जब प्राकृति की लाली चढ़ी...
   छोटी सी मैं.....


एक समय था,जंगल की सुखारी,
तपती-धूप की आग लगी...
छोटी पेड़ भी झूलस रहीं थी
जब प्राकृति की 'आह' लगी
छोटी सी मैं.....


   रो रहा बड़े पेड़ सभी, 
   कुछ पौधों की जान बची...
   कुद़रत की इस स्मशान से ऊबरे,
   पेड़ों भी अब सूख चला...
   छोटी सी मैं.....


जंगल को था,बसंत का मौका,
जलन पे 'लेप' चढ़ाना था...
उघटन-मौतों से,उबर रहा अब,
जब डालियों में 'पात' लगी...
छोटी सी मैं.....




        लेखक:-विकास कुमार लाभ
                       मधुबनी(बिहार)