में अधूरा...रह गया
और तुम तो पूरी हो गयी।

मेरी मूरत... बिखर-बिखर
कर तेरी सूरत बन गई।

बन गया... एक तेरा दर्पण 
बस छवि तेरी रह गई।

में अधूरा... रह  गया 
और तुम तो पूरी हो गई।

थी ललक... उत्साह जैसी
आशा से आसमान सी।

मेरे सपने... पर  काली छाया
स्याही सी बिखर गयी।

में अधूरा... रह गया
और तुम तो पूरी हो गई।

चाहकर तेरी... गलियों से गुजरा 
एक मुसाफिर बन गया।

बिन परिचय... भूलकर
तुझसे कुछ तो कह गया।

में अधूरा... रह गया 
और तुम तो पूरी हो गई।

शब्द तेरे... बाण से
नित मुझको घायल करते रहे।

रक्त में स्नान करके 
में तो धरा पर गिर गया‌

में अधूरा रह गया 
और तुम तो पूरी हो गई।

रह गई... मेरी अभिलाषा
रह गए अरमान से।

तुमने जब जब नैन चलाएं 
तीर विषैले कमान से।

में अधूरा... रह गया
हो तुम तो पूरी हो गई।

क्या कहूं क्या ना कहूं अब
कहना भी तो कुछ नहीं।

है अगर विश्वास भी तो 
अब जताना भी नहीं।

में अधूरा... रह गया
और तुम तो पूरी हो गई।

तेरी खातिर विश्वास मेरा
घुट-घुट कर मरता गया।

में अधूरा... रह गया 
और तुम अधूरी रह गई।


✍️लक्ष्मीनारायण ठाकुर

देवरी कलां जिला 
सागर मध्य प्रदेश।