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खिलखिलाने को जो मिला बचपन 
वह जिम्मेदारी उठाने में कुम्हला गया 
 वो मुस्कुराता बचपन यूंही सिसकता रह गया 
किसी गरीब के बच्चे का 
श्रम ढोता हुआ  बचपन
जैसे नई अदाकारी सीखता  चला गया
अल्हड़पन के दिनों में ही
वह समझदारी सीखता रह गया
एक अलग खनक एक अलग तरंग
अक्सर हुआ करती थी बचपन में
एक अलग रंगत एक अलग संगत
हुआ करती थी अल्हड़पन में 
अपनी नन्ही-सी कमर में 
बच्चों को उठाकर वह दौड़ लगाना
छोटी-सी उमर में ही
पहाड़-सी जिम्मेदारियाँ उठाना
ना ज़िद्द थी नए कपड़ों की
ना खेल-खिलौने गुड़ियों की
 उन्हीं ढेर सारे रिश्तों में  दब जाता था बचपन 
झूमती तितलीयों सा रंग  खो देता था बचपन
 ग़रीबी रोज ही तिल तिल मारा करती थी 
सबसे छोटी सबसे सयानी 
कह माँ बहला देती थी 
मत छीनों बच्चों के खेल-खिलौनें
मत बाँधो नन्हे पाँव में जंजीरें
ये कच्ची कलियाँ तोड़ ना देना
ये खुशियों के गुब्बारे फोड़ ना लेना
खिलखिलाता सा बचपन 
बेहद खुशनुमा होना चाहिए 
प्यार से प्यारा बचपन दुनिया की हर शै से न्यारा चाहिए.....

                    मीनाक्षी कुमावत 'मीरा'
                 स्थान - रोहिडा ( पिंडवाड़ा)
                       सिरोही , राजस्थान