एकांत ही मेरा अपना है
जिसमें रूबरू होती हूं खुद से
अपने आप को सोच पाती हूं
मैं कौन हूं जान पाती हूं ।

हर समय घिरी रहती हूं विचारों से
रिश्तो से और नातों से 
जीवन की उलझन भरी उलझनों से
बस एकांत ही तो मेरा अपना है ।

एकांत मेरा आईना है
इसके अंदर मेरा अक्स है
मैं संवरती हूं निखरती हूं
अपने को मजबूत कर पाती हूं ।

बिखर जाती हूं जब अपनों के तीक्ष्ण बाण से
एकांत में खुद को अपने से जोड़ पाती हूं
एक बार फिर उठ खड़ी होती हूं
नई उम्मीद से जिंदगी को जीती हूं ।

हां, एकांत से मुझे प्यार है
मेरे होने का देता एहसास है
सकारात्मक मुझे बनाता है
आत्मा को परमात्मा से मिलाता है ।


                   धनु दयाल