किसने कहा मैं मजबूर नहीं हूँ,
हाँ, मैं मजबूर हूँ, इसीलिए मजदूर हूँ,
या शायद मजदूर हूँ, इसीलिए मजबूर हूँ।

दुनिया वालों से मुझको
तिरस्कार मिलता रहा, 
पाते ही अवसर, बहू-बेटी की
अस्मत पर वार होता रहा,

खता भले न हो मेरी, पर मानता अपना कसूर हूँ।
किसने कहा मजबूर नहीं हूँ....

मैंने बच्चों को पढ़ने भेजा
पर किस्मत उनकी बदल न सका,
शिक्षा के मंदिर में भी उन्हें
शौचालय सफाई का हुक्म मिला,

समाज के ठेकेदारों के कारण, शिक्षा से भी दूर हूँ।
किसने कहा मजबूर नहीं हूँ....

करते जी तोड़ मजदूरी
जब कभी भी मैं बीमार हुआ,
जो गया इलाज के वास्ते
तो डॉक्टर ने दुत्कार दिया,

मेरी ग़रीबी से मैं हारा नहीं, पर तरसाया गया ज़रूर हूँ।
किसने कहा मजबूर नहीं हूँ....

जब मांगा हक मेरे हिस्से का,
मेरा प्रतिकार होता रहा,
मेरे नाम पे सियासत खेली गई
पर अधिकार मेरा मिलने से रहा,

कहानियों में जय पाता, किंतु हक़ीकत में शोषित हुज़ूर हूँ।
किसने कहा मजबूर नहीं मैं....
 
✍️प्रीति ताम्रकार
      जबलपुर