जब लिया एक एक अग्नि का फेरा,
जब तुमने हाथों में थाम लिया हाथ मेरा,
मन को आराम मिला नाम से तेरे मेरा नाम मिला,
अग्नि सा मिश्रण हो गया जीवन तुझमे मेरा।
जैसे जो अग्नि में जाता उसके जैसे हो जाता,
न कोई रँग न कोई आकार रह जाता,
उसी तरह साथ तेरे मन मिल गया मेरा।
एक एक वचन को निभाया,
अग्नि को साक्षी मान ,जो भी दोहराया,
मन पवित्र भावो से भरता गया मेरा।
चली आयी तेरे साथ,छोड़के रिश्ते खास,
तेरे पीछे -पीछे करती हर फेरे को याद,
कैसे भी रहे हालात साथ दिया पग-पग तेरा।
हर पथ पर कंधा मिलाकर चली,
चाहें पलक थे भीगे, या मुस्कुराकर चली,
हर सुख दुख था हमारा कुछ न तेरा मेरा।
जीवन की सुगम ,या हो दुर्गम परिस्थिति,
मेरे मन को याद आती बस एक ही स्थिति,
अपने हर कर्तव्य को निभाऊं, न छोडूं तुझे अकेला।
आज तक मैने निभाया हर अग्नि का फेरा,
हर फेरे की आँच में तपकर कुन्दन हुआ रिश्ता मेरा,
कभी न मुँह मोड़ा चाहें हो उज्ज्वल प्रभात, या हो घना अंधेरा।
फर्ज निभाना तुम बस इतना आखिरी बार,
सुलाक़े मुझको अंतिम शैय्या पर मेरे साजन,
बस आखिरी अभिलाषा को पूरा करना मेरा।
अपने हाथों से साजन देनामुक्ति मुझको ,
मुस्कुराके लेना साथ मेरे वो अंतिम अग्नि का फेरा,
वंचित न करना इससे यह अधिकार है मेरा।
अंजू दीक्षित,
बदायूँ ,उत्तर प्रदेश।

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