जन्म जन्म, का था बंधन, 
भाग्य लिख दिया, विधाता ने, 

कथनी और करनी में,होता फर्क, 
कैसा ये बंधन,कहलाया जन्मों का,

हँसी खुशी,साथ जिये वर्षों तलक, 
वो लम्हे वो पल, यादों का सफ़र, 

कुछ खट्टी कुछ मीठी, यादों का सफ़र, 
वो रुठना मनाना, ओ मान जाना, 

न कोई अहम्, न कोई तकरार, 
न बीच में कोई, दूसरा किरदार, 

न कोई फोन हो, न मोबाइल, 
न थी पीहर की, दखलंदाजी, 

साथ में हम, संग सारा परिवार, 
खो गये सारे,अब तो रिश्ते नाते, 

रह,कहाँ गया,जन्मों का नाता अब, 
स्वयं का भरोसा नहीं, न पल का, 

क्यों करें हम एतबार, हर क्षण, हर पल,
जिंदगी, भरोसे के काबिल, नहीं है दोस्तों ।

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    काव्य रचना -रजनी कटारे 
         जबलपुर (म. प्र.)