रण महाभारत का समापन
धर्म की स्थापना
धरती के नरेश
धर्म के देव रखे मानव तन
पांडवों में ज्येष्ठ
युधिष्ठिर धर्मराज
धर्म के देव
दे मान मुनि श्राप
एक साथ दो रूप रखे थे
कौन जानता
विदुर सुत दासी के
धृतराष्ट्र के अनुज
अनुज धर्म का पालन करते रहे
धर्म की राह दिखाते
धृतराष्ट्र न केवल हीन नैंत्रों से
कर्तव्य हीन भी
धर्म से आंख मोड़ते रहे
मोह से भी अंधे थे
पत्नी पतिब्रता
कब पूर्ण सत्य
पति को सत्य न समझाती
खुद नैत्र बंद कर
पति अनुचरी बन गयी
कैसा धर्म नारी का
नारी संगिनी धर्म की
धर्म राह दिखाती
न आंख बंद रखती पति की भूलों पर
धर्म के अवतार
अनुज की बातें न सुहाती रही
अनुज सत्य कहता रहा
धर्म पर चलता रहा
चापलूसी से दूर
सत्य का पुजारी
धृतराष्ट्र अंधे मोह में
अब अंधे भोगों के
जीवन का अंतिम काल
विदुर जी भगवतभक्ति में लीन
आ गये एक रोज
सत्य है
कर्तव्य से मुंह कब मोड़ते
अंत में ही सुधार चाहते
भाई का हित याचते
" आओ अनुज
व्यग्र मन मम
सुखमय जीवन
सभी से सम्मान
फिर भी छूटता सा है
समझ न आता
विदुर मेरे भाई
परामर्शदाता सत्य के
कुछ राह बताओ"
"प्रणाम बड़े बंधु
मैं क्या ज्ञानी
जीव संसार का
आज आया बहुत दिनों बाद
कभी सुनता बड़े भाई से कहानियाँ
आज एक कहानी सुनाता हूँ
जंगल एक रहस्यमई
विविध तरुओं से भरा
बहुधा पहुंच भी न पातीं किरणें
भगवान नारायण सूर्य की
विविधिता भरा वन
अंधकार से पूर्ण
कैसा आकर्षित कर लेता
जो आता
वहीं खो जाता
वापस न जाना चाहता
निकल सकता आराम से
अंधकार से प्रकाश में
कुछ मोह हो जाता
सुस्वाद फलों में खो जाता
वहीं का बन जाता
जीवन गंवा देता
अंधकार में ही
रवि के होने पर भी
रवि के अस्तित्व को नकराता
सचमुच जंगल रहस्यमई था
एक विप्र
आ गया वन मांहि
वह भी भुला बैठा खुद को
खुद का कार्य
जंगल तो बस राह में पड़ता है
निकलना भी है
पर वह न निकला
क्यों जाये बाहर
जीवन के सुखों को वहीं पाता रहा
सुस्वाद फलों से क्षुधा मिटाता रहा
एक दिन एक दसदंत महागज
विप्र को देख दोड़ा
जंगल था भयानक
केवल फल सुस्वाद ही न थे
भयंकर जीवों का निवास
विप्र आगे
गजराज पीछे
विप्र न चाहता वन से निकलना
मोह हो गया था
देख एक अंध कूप
वट वृक्ष की लताओं से भरा
उसी में गया लटक
इंतजार करने लगा
कब हटेगा महागज
कूप अंध में सर्प विषधर
विप्र को ताकने लगा
विप्र की जान फस गयी
ऊपर महागज
नीचे विषधर
दो मूषक पता नहीं क्यों
लगे काटने लता को
विप्र लटका जिससे
अब तो अंत ही जीवन
मूषक न थके
न हटा महागज
इंतजार विषधर का भी बना रहा
और विप्र क्या करने लगा
यही आश्चर्य महान
वट वृक्ष पर शहद का छत्ता
बूंदें टपक रहीं थीं
विप्र भूल गया संकट
मधु को चाटने में भूल गया सब कुछ
दस दंतों से कूप में राह बनाता महागज
मूषकों द्वारा काटी जाती लता
विषधर का इंतजार
और विप्र देख रहा
बूंद न गिरी मधु की बहुत देर से
इस बार खाली न जायेगी
मेरे मुंह में ही समायेगी
यह तो लाजबाब
फलों से भी अधिक बेहतर
इससे तो अच्छा बिता दूं जीवन
यों ही मधु को चाटते
भूल गया आ पहुंचा काल
एक नही अनेक रूपों में
अंत समय है
ईश्वर को नमन करना
भूलों का पश्चाताप
पर न कर सका
बूंदें दिख रहीं मधु की
अहा। अद्भुत रहस्यमई जंगल
वह है इस संसार का जंगल
अहा। अद्भुत रहस्यमई जंगल "
दिवा शंकर सारस्वत 'प्रशांत'

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