एक ..एक दिन कर के दिन निकलते गया।
आखिर शादी वाला दिन आ ही गया जिसका इंँतजार दोनो
पक्षो को बेसब्री से इंँतजार था।

घर मे आज खूब रौनक़ थी...रिश्तेदारो की खूब चहलपहल थी। ढोल नगाड़ों की आवाज कानो मे मिठास घोल रही थी।

मै अति उत्साहीत थी ,मेरे तो पैर ही जमीन मे नहीं पड़ रहे थे। ...

भाई की शादी वाले दिन  मैने  गुलाबी रंग का  का घाघरा चुन्नी पहना हुआ था...लम्बी गूँथ कर चोटी मैचिंग के साथ परांदा, मैटल की बहुत सारी कलाई मे चूडिय़ाँ,बड़ी-बड़ी अँखियों मे गहरे काले रंग का काजल, माथे पर गोल बिंदी, होठो पर लिपस्टिक ,कानों मे बड़े बड़े झूमके, कमर मे चुन्नी लगाकर कमरतागड़ी..सज सँवरकर .इतनी खूबसूरत लग रही थी मै, की माँ ने मेरे कानो के पीछे काजल का टिका लगा दिया यह कहकर कही मेरी बिटिया को नजर न लग जाए।

शादी के विवाहस्थल पर प्रिति और सगे संबंधी नाचने
गाने लगे

शादी की धूम मची है
शुभ मंँगल बेला आई
झूमो नाचो गाओ 
खाओ पियो मौज उड़ाओ
आंँगन में बज रही है शहनाई 
लाल शेरवानी पहनकर सर पर सेहरा बांँध कर
सोना सा राजकुमार लग रहा है मेरा भाई
घोड़े पर चढ़कर गठबंँधन करने आया मेरा भाई
सुंँदर सलोना सपना सजा रही थी कब से मेरी माई          
बाबा हर्षाय रुप्या पैसा खूब लूटाए 
काका नाचे ,काकी नाचे ,
नाचे सारे सगे संबंधी 
बहन "प्रीति" नजर न लग जाए
भाई को वारे नून राई
परिणय सूत्र में बँधकर 
कितनी सुंँदर भोजाई आई
विदा करा के लेकर आ गए 
अपने घर हम अपनी भौजाई।

घर में उपस्थित सभी जन आनँद विभोर होकर नाचते झूम उठे कह उठे "वाह भई वाह" शादी मे मजा आ गया।

शादी के दूसरे दिन  खुशियांँ बटोर कर और खुशियांँ देकर सभी सगे संबंधी अपने घर चले गए। सभी को बहुत थकान हो गई थी।
मै माँ और बाऊजी सभी सो गए थे।

"लेकिन चार नयन जग रहे होते है।
पिया मिलन की रात अपने शबाब पर है…..
चाँद तारो की बात कर रहे होते है….
दो दिल एकदूसरे के लिए धड़क रहे होते है।"

सुबह की सुहावनी कड़ी धूप खिड़की से सुषमा के
आँख मे पड़ते ही उठती है ,तो देखती है सुबह के
आठ बज रहे होते है।

जल्दी से उठकर वो नहा धोकर तैयार होती है।
बाहर आकर माँ बाबूजी के चरण स्पर्श करती है। देखती है , माँ और मै घर का सारा काम करके
नाश्ता बना चुके होते है। 

प्रीति - भाभी के लिए नाश्ता लाकर देती है ,और कहती है आप और भईया एकसाथ नाश्ता कर लीजिए , भैया को ड्यूटी मे 9बजे जाना है फिर सीधे आपकी मुलाकात रात को होगी। कुछ चाहिए होगा तो मुझे आवाज दे देना, वो क्या है न मुझे कबाब मे हड्डी नहीं बननी है।यह बोलकर हँसते हुए चली जाती है।

मनु और बाबुजी अपनी ड्यूटी के लिए निकल जाते है।प्रीति अपने कमरे मे, सुषमा माँ के पास आकर
कहती है कुछ काम है तो बता दीजिए …

माँ कहती है भाभी से अपना कमरा ठीक कर लो अभी दो चार दिन हुए है तुम्हें आए हुए ,थकी हुई होगी आराम कर लो….।ऐसे भी जिंंदगी भर तुम्हें ही संभालना है इस घर को।

सुषमा कहती है ...नहीं माँ आप कहिये न..। मै बैठे बैठे बहुत बोर हो रही हूँ।..

माँ स्टोर रूम साफ कर रही थी ...शादी के काम मे सारा कमरा उथल पुथल हो गया...सुषमा भी बिना
कुछ कहे माँ का काम मे हाथ बँटाने लगी।

सफाई करते वक्त सुषमा को पुरानी एलबम मिली।
उसे खोलकर वह देखने लगी। मनु की बचपन की
तस्वीर देखकर मुस्काने लगी।

माँ ने पूछा क्या हुआ कयुँ हँस रही हो इतना,सुषमा ने तस्वीर दिखाई …

माँ ने कहा ..अच्छा मनु को नहलाते वक्त की तस्वीर…..फिर.दोनो हँसने लगी।

सुषमा ने एक तस्वीर देखी .।जिसमें पूरा परिवार एक साथ था मगर एक को वो पहचान न पाई,

भाभी ने माँ से पूछा.. "ये कौन है??"

माँ ने जल्दी से वो एलबम सुषमा से लगभग छीनकर
ले लिया...बोली अरे कोई नहीं…

माँ ने कहा "चलो बाद मे करेंगे सफाई,तुम्हें भूख लग गई होगी। तुम्हारे लिए फल काट देते है ..।"

सुषमा को कुछ संदेह हुआ। आखिर माँ ने मेरे हाथो से क्यों छीन लिया ?? कोई तो बात है? यह विचार कर वो चुपके से जाकर स्टोररूम से तस्वीर निकाल कर ले आती है।

सुषमा मनु से  "रात को  पूछती है एक बात तुमसे पूछ रहे है देखो झूठ ना कहना"

मनु कहता है "रोमांटिक अंदाज मे.. पूछो क्या पूछना है ...मै क्यों अपनी दुल्हन से झूठ बोलूंँगा।"

सुषमा वो तस्वीर मनु को दिखाती है। मनु आश्चर्य से
बोलता है ये तस्वीर तुम्हें कहाँ से मिली।

सुषमा ने मनु को बताया तस्वीर मिलने की बात।

फिर मनु से पूछा बताओ कौन है ये….मनु ने कहा मुझे भी नहीं मालूम…

सुषमा ने कहा मै प्रीती से पूँछ लूँगी...वो तो जरुर बता देगी मुझे…

मनु ने जाती हुई सुषमा की कलाई पकड़ ली और
कहा रूको उससे कभी मत पूछना...उसे तो कुछ
पता भी नहीं…

सुषमा सोच मे पड़ जाती है। "कोई तो.बात है पहले माँ छुपा रही थी अब तुम , मै भी इसी घर की सदस्य हूँ मुझे भी जानने का पूरा हक है...फिर कहती है तुम ही बता दो..।"

मनु कहता है "ये कैसी जिद्द है तुम्हारी "…

सुषमा ने कहा "जिद्द ही सही" ...लेकिन मुझे जानना है।"

मनु कहता है."अभी ..अभी हमारी शादी हुई है..आओ पल..दो..पल प्यारी भरी बाते करे।"
"ये क्या लेकर बैठ गई हो तुम"

सुषमा ने कहा "शादी के सात फेरो लेकर कसम खाया है तुमने कुछ नहीं छुपाओगे।"

सुषमा - "तुम्हें कसम है मेरी...नहीं तो रहो हम से दूर..।करीब आने की सोचना भी मत।"

मनु विवश हो जाता है सुषमा की जिद्द के आगे।

मनु सषमा को "बताता है ये तस्वीर मेरी बड़ी दीदी की है
और प्रीति उनकी बेटी….और बीती बाते सब उसे
बताता है।"

सुषमा कहती है "अच्छा मतलब प्रीति तुम्हारी बहन नहीं भांजी है …"

मनु ने कहा "हाँ"

मनु लेकिन सुषमा, प्रीति को इस बात का कभी पता नही चलना चाहिए।

लेकिन सुषमा के दिमाग मे कुछ और ही चल रहा होता है।..

सुबह उठकर सुषमा फटाफट तैयार हो जाती है।
मनु उठकर देखता है और कहता है ,क्या बात है
देवी बहुत खूबसूरत लग रही हो..बनठन कर कहाँ
चली।

सुषमा ने कहा ",जाऊँगी कहाँ?? ...शादी के लिए जाँब से छुट्टी ले रखी थी..आज से ज्वाईन करने की सोच रही हूँ...नहीं तो मेरे पैसे कट जाऐंगे ….मेरा मायके
मे कोई कमाने वाला नहीं है ...मेरे जाँब की वजह से घर चलता है...छोटा है अभी मेरा भाई...उसे भी पढाई करके मुझे बड़ा आदमी बनाना है….बहुत सारी जिम्मेदारी है मुझ पर।"

मनु ने कहा "तुमने माँ बाऊजी को बता दिया"

सुषमा ने कहा "नहीं अभी नहीं...जाते वक्त बता दूँगी
मनु ने कहा ठीक है…"

मनु - "मै भी तैयार हो जाता हूँ नहीं तो लेट हो जाऊँगा।"

सुषमा को तैयार देखकर माँ और प्रीति दोनोँ खुश हो जाते है...
सुषमा प्रीति से पूछती है" नाश्ता बन गया है क्या??"

प्रीति ने कहा "हाँ भाभी"

सुषमा ने कहा  "प्लीज ला दो न...मुझे बहुत तेज भूख लगी है...फिर मुझे आफिस भी जाना है।"

प्रीति नाश्ता लाने चली जाती है।

माँ ने बोला बहुरिया मनु का इँतजार कर लेती ...साथ ही खा लेती उसके। वैसे तुम क्या काम करती हो...मुझे तो नहीं पता।

प्रिति  - मै नाश्ता लाकर अपनी भाभी को देती हूँ।

सुषमा खाते खाते बताती है "मै चिकित्सा विभाग मे
C.M.O.H के पोस्ट पर हूँ।
पिताजी के जाने के बाद उनका जाँब ..मुझे मिल गया।"

सुषमा "कल से खाना जल्दी बना दीजिएगा। टिफिन लेकर जाऊँगी। मुझे तो आने मे लेट होगा..
रात के नौ बजे छुट्टी मिलती है। आते आते मुझे
दस तो बज ही जाएगा।
ये बोलकर सुषमा ने अपना बैग उठाया ..और चलती बनी।"

मै और माँ एकदूसरे का मुहँ देखते ही रह गए।

क्रमशः........