वो मन जो जीना चाहता है बचपन में,
नही बंधना चाहता है जो जिम्मेदारी की जंजीरों में।
खुल कर जीना मौज मस्ती करना यही उसे भाता है,
भँवरे की तरह कभी इस फूल कभी उस फूल पर मंडराना आता है।
वो चंचल मन शैतानियों से भरा होता है,
न बर्तमान की चिंता न भविष्य का डर बेखौफ जिंदगी जीता है।
मिट्टी के घरौंदों में ताजमहल देखता है,
और अपनी कल्पनाओं में आसमाँ को कैद करने चाहता है।
बारिस में कागज की कश्ती चलाना चाहता है,
वो बावरा मन बिन नींद के कई ख्वाब देखना चाहता है।।
शीला द्विवेदी "अक्षरा"

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