चीरकर पहाड़ों को नदी बहते जा रही थी....!
समंदर से मिलने, कहते जा रही थी....!!
सुख चुका है आँखों का पानी,
जुदाई का दर्द सहते जा रही थी....!!!
रूकीं नही किसी भी मोड़ पर
पता जो हवाओं से पूछते जा रही थी....!!!!
आखिरकार पाकर अपनी मंजिल को
खुद पर इठलाते जा रही थी....!!!!!
जब आयीं मिलन घडी,
सागर को देख खुद को खोते जा रही थी....!!!!!!
गँवा कर अपना अस्तित्व,
समंदर में समाते जा रही थी....!!!!!!!
कुमारी आरती सुधाकर सिरसाट
बुरहानपुर मध्यप्रदेश

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