मॉरिशस,🐬⛵ ये है, हमारा छोटा सा हिन्दुस्तान ,बहुत संघर्ष के बाद हमें आज़ादी की खुली सांस मयस्सर हुई।
हम गिरमिटिया मजदूर हैं,अंग्रेज़ हमें भारत से यहां ले आए थे ,मजदूरी कराने। हमारे यूपी ,बिहार के भाई,गरीबी में जीवन यापन कर रहे थे, हमपर कर्ज का बोझ बहुत था,तंगहाली की जिंदगी बसर कर रहे थे।
साहूकारों का कर्ज बढ चुका था ,जिसके कारण खेत गिरवी थे।विकट स्थिति थी।
हमारे गांव से पहले गए लोग जो मॉरिशस,सूडान,सूरीनाम जैसे देशों में जा चुके थे,लेकिन हमें नहीं मालूम था कि, वे कैसे हैं किस हालत में अपनी जिंदगी बसर कर रहे ,हमें प्रलोभन दिया गया कि ,परदेश में हमारी जिंदगी बेहतर होगी।
हम भी बेहतर भविष्य की तलाश में अपना वतन ,अपने लोग छोड़ चल पड़े।पहले हमे रेलगाड़ी से कलकत्ता पहुंचाया गया,फिर पानी के जहाज की कष्टप्रद सफर करके सात समंदर पार छोटे से देश मॉरिशस पहुंचे।
हमारे पूर्वजों से अंग्रेज़ो ने कागज पर अंगूठा लगवा 5 साल का एग्रीमेंट करवाया था, कि हम अपने वतन 5 साल बाद ही पाएंगे ।
जिसे हमारे पूर्वजों ने अपभ्रंश कर गिरमिट कहना शुरू किया और हमलोग तब से हम गिरमिटिया मजदूर कहलाने लगे।
हम जब यहां पहुंचे तो यहां की स्थिति भयावह थी ।,गन्ने के खेतो मे हमें बैलों की तरह काम करवाया जाता था, कोड़े,और डंडे तो आम थे।काफी प्रताड़ना के बाद जो तनख्वाह हमें मिलती वो सिर्फ गुजारा करने को काफी थी,हम बचा नहीं पा रहे थे ,जिसे हिन्दुस्तान भेज अपने खेत खलिहान छूडा पाएं ।
महिलाओ और बच्चो की भी स्थिति बदतर थी।जवान महिलाओं का मालिक शारीरिक शोषण करते,और बच्चे पैदा होते ही ,बंधुआ हो जाते।
हम जब काम से खाली होते तो अपना दर्द भूल एकत्र हो आपस में एक दूसरे का दर्द बांटते , अपने लोक गीत ,अपने पर्व त्योहार मनाते और अपने गम भूलने का प्रयत्न करते।रेडियो हमारे लिए मनोरंजन,और अपने देश में हो रही गतिविधियों से रूबरू होने का जरिया था।
बंधुआ प्रथा को जड़ से उखाडने और अधिनियम वापस लेने के लिए भारतीय नेता धरना ,प्रदर्शन कर रहे थे।दक्षिण अफ्रीका से लेकर,अहमदाबाद, हर जगह पूरा विरोध हो रहा था।
फिजी में हमारे गिर् मिट भाई,तोताराम भी बढ़ चढ़ कर हिस्सा ले रहे थे।
१९१७ मार्च का महीना है,आज अंतिम अल्टीमेटम दे दिया गया है।,रेडियो में बताया गया ,सी,एंड्रूज,गांधीजी,नायडू द्वारा कि मई तक यह बंधुआ मजदूरी अधिनियम वापस हो जाय।
हम रेडियो में ये समाचार सुन बहुत खुश थे हमें आज़ादी मिलने वाली थी।
हम वापस जाएंगे,ये सोच सोच मार्च से मई आ गई ।
और 🌞🌟🌞🎉वह सुबह आयी ,जिसमे हम आजाद थे।
हम अब किसी के बंधुआ नहीं थे।पिंजड़े में बंद उस पक्षी जैसे हालात थे,अब हमारे।हम वतन वापस भी जाना चाह रहे थे ,और नहीं भी ।
हिंदुस्तान में अब हमारे खेत ,खलिहान बचे ही नहीं थे,तो क्या करते। कुछ सगे संबंधी बचे थे,वो भी भूल ही चुके थे।
हम आज़ाद थे,हम मेहनती थी,हमारे लोग थे।
हमने एक नया हिंदुस्तान बनाया,अपने धर्मग्रंथ,अपने रीति रिवाजों के साथ।हम भारतीय ,पराए देश में अब शान से है,अपने दम पर ।
आगे देखना पूरी दुनिया में हम हिंदुस्तानियों के हुनर का डंका बजेगा।
⛱️🏝️🎤🎶❇️❇️❇️
स्वरचित_ संगीता

0 टिप्पणियाँ