अविराम चलती रही मैं,
कर्तव्य पथ पर सस्मित !
लौट आयी अधिकार के द्वार से ,
कर आंसुओं की अर्ध अर्पित !
अविज्ञ  नहीं तू ,
अनन्त पीड़ाओं से मेरी  !
बस आदी हो गया है मेरी,
सिसकियों को सुनने का !
अब जड़ हो गई हूं मैं ,
परिताप करते करते !
नहीं बचा है शेष आंसू ,
मेरी चक्षुओं के आकर में !

......✍️ पिंकी मिश्रा
भागलपुर बिहार