प्रश्न का एक ही उत्तर है । जिम्मेदार हम ।
लेकिन मेरा जवाब है, जिम्मेदार मैं ।

क्योंकि मुझ में इतनी हिम्मत नहीं कि जब मेरे पड़ोसी पानी का पाइप लगाकर आंगन धोते हैं, हर रोज ढेर पानी बहाते 
हैं । मैं मन ही मन उनके इस व्यवहार को देखकर अपना खून जलाती हूं लेकिन कुछ कहती नहीं हूं । हालांकि वे रोज मुझे भी देखते हैं कि मैं पानी बहाने के बजाय बस पौंछा ही लगाती हूं ।

मैं हूं जिम्मेदार, क्योंकि मैं अपने उस पड़ोसी को आज तक नहीं कह पाई, जिसने अपने घर के बाहर बड़ा सा मंदिर बना लिया और वहां एक बड़ी मरकरी लाइट लगवा ली जो रात - दिन, हर वक्त जलती रहती है । लाइट का कनेक्शन बाहर के तार से जुड़ा है जिसका बिल उन्हें नहीं भरना पड़ता है । जबकि मेरे घर के बाहर लगी खंबे की लाइट, मैं सुबह याद से बंद कर देती हूं । जैसे मैं रोज उन्हें देखती हूं वैसे वह भी मुझे लाइट बंद करते देखते ही होगें । सोते हुए को तो जगाया जा सकता है लेकिन जागे हुए को कैसे जगाएं ?

मैं हूं जिम्मेदार, क्योंकि मैं सख्ती से उन्हें रोक ना पाई ।
गली में जब भी गोलगप्पे बेचने वाला आता है, सब गोलगप्पे खाने के बाद दोने वहीं पर फेंक देते हैं । एक - दो बार मैंने कोशिश की बताने की कि गोलगप्पे वाले भैया के ठेले में डस्टबिन है, उसमें दोने डाला करो । लेकिन अनपढ़ और पढ़े-लिखे, किसी को कुछ समझ नहीं आया ।

मैं हूं जिम्मेदार, क्योंकि बम - पटाखों के शोर को खुशी का नाम देने वालों का विरोध नहीं कर पाती । जिससे ना केवल कचरा फैलता है बल्कि वायु प्रदूषण और ध्वनि प्रदूषण भी होता है ।

मैं हूं जिम्मेदार, जो अपने आसपास अनीति देखते हुए भी आंखें मूंद लेती हूं । जो नवरात्रि और दूसरे आयोजनों पर भोजन कराने के नाम पर थर्माकोल की झूठी प्लेटों का ढेर बाहर फेंक देते हैं ।

ऐसा नहीं है कि वे सफाई नहीं करते । देर सवेर सफाई हो ही जाती है । पर आदत में यही शामिल है कि जहां मर्जी कचरा फेंक दो । बाहर कहीं घूमने जाने पर भी ऐसे ही कचरा फैलाते होंगे ।

किसी के पास यदि सुझाव हो मेरे लिए तो कृपया कर जरूर बताएं । क्योंकि इन पड़ोसियों से बात करने का मतलब है झगड़ा करना ।