कोई कहता है समय,
तो कोई कहता काल है।
जिसके आगे किसीकी न चले,
वही समय की चाल है।।
कभी भोर की स्वर्णिम आभा,
तो कभी महकती साँझ है।
कठपुतली हम इसके हाथ की,
ये सबका सरताज है।।
तीन चरणों में विभाजित,
भूत भविष्य बर्तमान है।
निशि-दिन जिसके पंख है दोनों,
आदि से अंत उड़ान है।।
एक बार जो बीत गया,
वो नही लौट कर आता है।
व्यर्थ नष्ट मत होने दो मुझे,
दुनिया को बतलाता है।।
नित्य निरन्तर है गति जिसकी,
सबके लिए समान है।
ये कर्मों का है फलदाता,
समय बड़ा बलवान है।।
स्वरचित एवं मौलिक
शीला द्विवेदी "अक्षरा"

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