कभी दिखाता आशा नयी भोर सी,
कभी शान्ती जग में हुये शोर की,
नजरिया आपका है ये तो जनाब
ललिमा फैलाता अम्बर,चहुँ ओर ही....।

रंगीन वो जिन्दगी को दिखाये,
प्रभात को फिर हौले से लाये,
काली रात की छटा सिमटाये,
उमंगें नाचे हृदय में फिर मोर सी
नजरिया आपका है ये तो जनाब
ललिमा फैलाता अम्बर,चहुँ ओर ही....।

शाम को जब उसे जाते देखो,
नारंगी आकाश को विदाई न समझो,
गहराई उसकी फिर खुद ही बूझो,
तब जानोगे कीमत जीवन के हर छोर की
नजरिया आपका है ये तो जनाब
ललिमा फैलाता अम्बर,चहुँ ओर ही....।

वो जो सारे दिन चमकता है,
सुबह-शाम थोड़ा सा ठहरता है,
संघर्ष हेतु खुद को तैयार करता है,
उसे न जरूरत उगने को किसी और की
नजरिया आपका है ये तो जनाब
ललिमा फैलाता अम्बर,चहुँ ओर ही....।

बहुत कुछ सीखाता वो लाल अम्बर,
खत्म भी करो अब ये हारने का डर,
उठो और बजूद को जाने दो उभर,
प्रोत्साहन की ये बातें,क्यूँ न अबतक गौर की?
नजरिया आपका है ये तो जनाब
ललिमा फैलाता अम्बर,चहुँ ओर ही....।

स्वरचित व मौलिक✍
सुमित सिंह पवार "पवार"
उत्तर प्रदेश पुलिस 
आगरा