मत पूछो,मैं फिर बोलूंगा और तुम सुन न पाओगे। कोई कहेगा कि ये बड़ बोला है,कोई ऐरोगेंट कहेगा कोई मेरे कहे शब्दों को देशद्रोह से तुलना करेगा और कोई मुझे सनकी भी कह सकता है। फिर भी मुझे जो अच्छा नहीं दिखेगा,जो अच्छा नहीं लगेगा और जो वास्तव में समाज व् देश के खिलाफ होगा मैं उसके खिलाफ अपनी आवाज बुलन्द करते रहूँगा।      
   देश बहुत बड़ा तो है,पर पब्लिक उससे भी कई गुना ज्यादा है। पब्लिक को कंट्रोल करने का कोई मैकेनिज्म नहीं।पब्लिक ज्यादा है तो खाने-पीना भी ज्यादा ही तो होगा,पर खाने-पीने की चीजों में मिलावट रोकने का भी कोई पक्का मैकेनिज्म नहीं। पब्लिक ज्यादा है तो रोग व रोगी भी ज्यादा ही हैं बबुआ,पर रोगियो की दवा व डॉक्टर के नकली असली की पहचान के लिए कोई मैकेनिज्म नहीं। पब्लिक ज्यादा है तो दंगा-फसाद भी कुछ ज्यादा ही हो जाते हैं पर उनको रोकने का भी कोई मैकेनिज्म नहीं। पब्लिक ज्यादा तो कोर्ट कचहरी के चक्कर भी ज्यादा ही होंगे पर न्याय व्यवस्था वही अंग्रेजो के जमाने की।         
फिर कहता हूँ मत पूछो,पूछोगे तो मैं बोलूंगा ही न। अब ज्यादा पड़ोसी पालोगे तो उनके गाय-भैंसिया भी खेत-खलिहान में आएंगे ही,तो उनसे बचना है तो अपनी सरहदों में पक्की बाड़ से ही काम न चलेगा। ये ससुरा जान-बूझकर अपने लोगों को इधर धकियाते हैं जैसे हमारे देश ने सबके लिए लंगर लगाया हो। पर विदेशी नागरिकों को देश से बाहर करने का भी कोई मैकेनिज्म नहीं। और तो और हर राज्य की अपनी भाषा,अपनी शिक्षा,अपना बोर्ड और मातृ भाषा फिर भी हिंदी। लोग गोली की तरह दनादन अंग्रेजी में बतियाते हुए गौरवान्वित होते हैं गरीबों पर ताना मारते हैं पर मैकेनिज्म उड़नछू है। किसान खेतों में मर रहे हैं,नेता हवाई यात्रा से ही मौका मुयाना करके मुवावजे की राशि की घोषणा कर रहे हैं यानि किसी की मौत पर भी राजनीति करने का भी मैकेनिज्म नहीं।    
  तो जब कहीं कुछ मैकेनिज्म ही नहीं तो ये घर-घर से अलगाववादी ही तो निकलेंगे ।  सौ मारकर एक गिनो फिर देखो क्या परिणाम आता है। वोट के चक्कर में आतंकवादियों के सर न गिनो,भ्रष्टाचारियों को न बक्सो। जैसे को तैसा की नीति पर चलो ये ही असली मैकेनिज्म है बबुआ। 



भूपेन्द्र डोंगरियाल