प्राचीन काल में इरावती नाम की एक गणिका रहा करती थी।
राज्य में एक पहुंचे संत आए थे,उनके पास बहुत भीड़ होती थी।सभी अपने उद्धार का उपाय पूछ रही थे।
इरावती उधर से पालकी से गुजर रही थी।
वह भी पालकी से उतर संत से मिलने गई ,और संत से अपने उद्धार का मार्ग पूछा।
संत ने तपस्या और अच्छे कार्य करने का सुझाव दिया।
गणिका ने कहा " महाराज मैं ये नहीं कर सकती ,क्योंकि मुझे पुरुषों का संग करना अच्छा लगता है।
संत ने सुझाव दिया -  तुम एक काम करो ,जो भी पुरूष रात को तुम्हारे पास आए,तुम उसे पति के जैसा समझो,उसकी सेवा करो ।
इरावती मान गई।
अगले दिन अपने सभी ग्राहकों को वह रात 
अपना पति समझ उसकी सेवा सुश्रुषा करती।  
एक दिन की बात है,भगवान ने उसकी परीक्षा लेनी चाही।
पुरुष ग्राहक के रूप में वे उसके पास आए,इरावती ने हर तरह से खूब सेवा की ।
रात्रि को  पुरुष रूपी भगवान ने प्राण निकलने की लीला रची। 
उन्होंने पेट में दर्द कह प्राण त्याग दिए।
इरावती  घबरा गई।
चारों दिशाओं में ख़बर आग की तरह फ़ैल गई कि रात्रि में जो पुरुष इरावती के कोठे पर आया,उसकी मृत्यु हो गई है।
उसके बाद लाश अर्थी पर लिटाई गई।
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सभी शमशानघाट पहुंचे,इरावती भी सती होने के इरादे से पहुंची ,आखिर वो रात की विवाहिता थी।
वह चिता पर पति के सर को गोद में रखकर बैठ गई।चिता में अग्नि प्रज्वलित की गई।
आग पकड़ने लगी, वह टस से मस न हुई।
अंत में भगवान को साक्षात दर्शन देना ,पड़ा ।
और उन्होंने उसकी इच्छा पूछी।
इरावती ने कहा" भगवन् जब आप मेरी गोद में थे तो मुझे अभूतपूर्व शांति मिली। 
भगवान ने कहा ऐसा ही होगा ।और मरने के बाद इरावती को सद्गति प्रदान हुई।
( यह कहानी पौराणिक  है, पात्र का संबंध किसी से मिलता जुलता हो सकता है।"


संगीता