गांव की रोशनी कितनी प्रकाशमान,मन को आनंदित करने वाली होती है।बचपन में हमारी हर छुट्टियां गांव में गुजरती थी।हम सब भाई बहन मिलकर कितना मजा करते थे।गांव का जीवन कितना शुद्ध होता है।जैसे ही सूर्योदय होता हैं।चहूंओर रोशनी फैल जाती हैं।🌞🌞

मैंने अपने बचपन का अधिकांश पल गांव में जिया है।मुझे अपना गांव बहुत पसंद है चाहे वह दादी का हो या नानी का।🙂🙂उस समय तो बिजली अधिकतर गुल हो जाती थी।लेकिन हमें कोई फर्क नहीं पड़ता था।हम अपने खेल में मस्त रहते थे।न धूप लगती थी न गर्मी,वह पल भी कितना प्यारा था,जो भुलाए नहीं भूलता। हर चीज रोशनी भरा ही तो था। परछी(बरामदे)में बैठकर खाना,खाना आंगन में खेलना।मैंने तो भरपूर रोशनी  गांव में ही देखी है।कम सुविधाओं में भी प्रकृति के बहुत समीप ऊर्जावान प्रकाशमान जीवन।
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                    जब मन करता तालाब की सैर कर आते खेतों की पगडंडियों में दौड़ लगाते।काश वो मेरा बचपन फिर से मिल जाए। दिनभर की धमाचौकड़ी के बाद जब रात में हम अपने आंगन में सोते थे।तो वो रात की मद्धम रोशनी,चांद सितारों से भरे नीले आकाश कितनी सुहानी लगती थी।हम सब भाई बहन में मुकाबला होता कि तारों को जोड़कर कौन पहले आकार का नाम बताएगा और जो बच्चा हवाई जहाज के रंगीन लाइट पहले देख लेता वह तो राजा ही कहलाता।😀😀और हम सब उसी में ही कितने खुश हो जाया करते थे।कितना प्यारा भोला व सुंदर बचपन था। 🧑‍🤝‍🧑 👭 👫 👬 🧑‍🤝‍🧑

वैसे अभी भी हम अपने गांव जाने से मौके का लाभ अवश्य उठाते हैं।लेकिन बचपना पहले जैसा नहीं रहा आधुनिकता ने बहुत कुछ बदलाव गांव में भी लाए हैं। अंत में यही कहूंगी।हम शहर की कितनी चकाचौंध में खो जाए।प्रकृति की सुंदरता रोशनी से भरा जीवन तो हम गांव में जी पाते हैं।इसलिए जब भी मौका मिले अपने व्यस्त जीवन में कुछ पल अपने गांव में भी जरूर बिताइए। गांव की मिट्टी की महक,वो अहसास बहुत ही प्यारी होती है।

😊❤️मेरे गांव का "रोशनी भरा मेरा बचपन" जो मेरे स्मृति पटल में सदा-सदा रहेगा।😊❤️🤞

                    मनीषा भुआर्य ठाकुर(कर्नाटक)