खुशियों की तिजोरी की सुलभ सी कुंजी हूंँ,
जीवन के अनुभवों की अक्षय पूंँजी हूंँ।
तपती दोपहरी में, घने पेड़ की छाया हूंँ,
पिता का स्नेह, मां के आंँचल का साया हूंँ।
भाई के प्यार का, बहन के दुलार का,
भाभी के मनुहार का, स्नेह अनुराग हूंँ
बुजुर्गों के दुआओं में,जीवन का सार हूंँ।
सर्द रातों में रजाई की गर्माहट हूंँ,
तपती गर्मी में शीतलता की आहट हूंँ।
तीज- त्योहार, सुख-दुख साथ साथ होता है,
चोट एक को लगे तो दर्द सभी को होता है।
साथ अगर हो अपनों का तो, खुशियों का अंबार हूँ,
हांँ भाई हांँ! मैं तेरा हंँसता- खेलता "परिवार" हूंँ।
चंद पंक्तियों में, मैं समा नहीं सकता,
"सिर्फ एहसास हूंँ" मैं बता नहीं सकता।
एकता की फ्रेम में मढ़ी तस्वीर की कूची हूंँ,
खुशियों के तिजोरी की सुलभ सी कुंजी हूंँ,
जीवन के अनुभवों की अक्षय पूँजी हूंँ
'परिवार दिवस' के अवसर पर सभी परिवार के सुखद और समृद्धिशाली भविष्य की कामना के साथ समर्पित
मीनू 'सुधा

0 टिप्पणियाँ