प्रकृति की गोद में बसा हुआ मेरा बो खूबसूरत सा गांव है।
जहां नीम, पीपल, वरगद और शीशम की छांव है।।
मिलती है ताजी हवा,
सुबह और शाम जहां।
घर के बाहर लगी रहती है,
बड़े बुजुर्गों की बैठक जहां।।
कहीं कोयल के प्यारे-प्यारे गीत है,
तो कहीं कौए की कांव-कांव है।
                     प्रकृति की गोद में बसा......................

कहीं है कागज की कस्ती,
तो कहीं सावन के झूले है।
बहुत प्यारी है गांव की बो गलियां,
जिन गलियों में हम खेले है।।
कहीं बाजती है पैरों में घुंघरू,
तो कहीं ढोलक की थाप है।
                     प्रकृति की गोद में बसा.....................

बो खेतों की पगडंडी है,
बो बागों की हरियाली है।
सुबह साँझ जो मन को भाए,
बो सूरज की लाली है।।
आपस में सबका दिल से,
आदर और सम्मान का भाव है।
                   प्रकृति की गोद में बसा......................

कहीं चूरन की पुड़िया है,
तो कहीं चाट के ठेले है।
कितने सुहावने लगते है,
बो गांव के मेले है।।
मंदिरों के सत्संग में 
होता लोगों का जमाव है।
प्रकृति की गोद में बसा मेरा बो खूबसूरत सा गांव है।।



शीला द्विवेदी" अक्षरा"