कभी कहीं से दौड़ा आऊँ मैं,
अमृत प्यार सदा पाऊँ मैं...
कितना भी मुझे डांट मिले भी,
छिप-छिप जाऊँ माँ की आँचल में...
नभ में तारें सूर्य प्रकाशमय,
हो या ना हो अँधियारा...
प्यार माँ की प्रकाशमयी है,
होता फिर ये सवेरा...
दिनमयीं है माँ की ममता,
दर्द से कभी हम छटपटाये...
बैचैन रहती वो भी जब तक,
आराम ना मिलजाये...
जब पकाती रोटी ताबों पर,
हर बार हाथ जल-जल जाये...
दर्द सिमटकर रखती जब तक,
मन सभी का ना भर जाये...
तेरी याद बहुत आती है,
किसी से नहीं कह पाता हूँ...
ऐसा दुलार कहीं नहीं मिलता,
जितना तुममें प्यार पाता हूँ...
तुम्हारी आशीर्वाद ही काफी है,
हर लक्ष्यको भेदने के लिए...
फिर लौटूँगा तुम्हारी आँचल में,
ढ़ेर सारी खुशियाँ देने के लिए...
लेखक:-विकास कुमार लाभ
मधुबनी(बिहार)

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