रोज की तरह उस दिन भी मैं लंच टाइम में मेरे मित्र तिवारी जी के साथ नाश्ता करने पास के होटल की तरफ जाने लगा। बैंक में आज अत्यधिक काम होने के कारण वे झुंझलाये हुये मुझसे शिकायत कर रहे थे "यह बैंक का काम सबसे बेकार काम है। एक हम हैं कि गधे की तरह दिन भर खटते रहते हैं और हमारी वेतन बढ़ोत्तरी में सरकार सैकड़ों अड़ंगे लगाती है , वहीं सरकारी कर्मचारियों को बैठे बैठे वेतन में बढ़ोत्तरी हो जाती है,कुछ कामकाज करें या न करें ! हमारा किस्मत ही खराब है ,जो इस बैंक की नौकरी में फंस गये।" मैं उनकी बात सुनते चला जा रहा था कि हम ठीक उस जगह पहुंचे जहाँ एक व्यक्ति हररोज़ सड़क के किनारे एक पेड़ के नीचे एक चादर बिछाये कुछ हथेली के चित्र फैलाये बैठा रहता था ,जिसमें कई रेखाएं और ग्रहों के नाम आदि लिखे होते थे। उसके बायें ओर एक पुरानी लाल जिल्दवाली मोटी किताब रखी रहती थी,जिस पर लिखा रहता था "भाग्यरेखा"। उसकी उम्र कोई साठ- बासठ के करीब होगी। दुबला पतला तन,बढ़ी हुई दाढ़ी और मूंछें ,धोती -कुर्ता पहने ,चेहरे पर लाचारी की रेखायें स्पष्ट झलकती हुई वह एक कर्मवीर की तरह उस चादर पर बैठा रहता था।जब कोई सड़क परउसके बगल से निकलता तो वह बड़ी आशा भरे नजरों से उनकी ओर ताकता कि वे उसके पास अपनी हाथ दिखायें ,अपनी कुंडली दिखायें ताकि उसकी जिंदगी का गुजर बसर हो सके। शाम तक कोई इक्का दुक्का ग्रामीण आकर हाथ दिखा गया तो ठीक,नहीं तो अंधेरा होते- होते वह अपनी किताब और अन्य सामान समेटकर भारी कदमों से अपने घर की ओर बढ़ जाता।मैं बैंक आते जाते रोज उसे देखता थाऔर मन में कई बातें उठती थी।
उस दिन ज्योंही हम दोनों उसके बगल से गुजर रहे थे, वह बूढ़ा बड़ी आशा से हमसे बोला -"बाबूजी, भाग्यपरीक्षा करायेंगे?" उसका इतना कहना ही था कि तिवारी जी एकदम से बिफर पड़े और जोर से चिल्लाये,"अरे पहले तुम अपनी भाग्य की परीक्षा तो कर लो, जो इस तरह मारे- मारे फिरते हो, बड़ा आया भाग्यपरीक्षा करने!" तिवारी जी के इस तरस चीखने पर वह बूढ़ा बेचारा तिलमिला गया। गरीब आदमी भला क्या कर सकता था?सचमुच उस दिन उसकी किस्मत ही खराब थी, जो एक आदमी उसे बेवजह इतनी चोट पहुंचाई। अरे, हाथ नहीं दिखाना तो नहीं दिखाते, पर एक गरीब व्यक्ति को इस तरह दुत्कारना कहाँ का न्याय है?वह बेचारा झेंप गया और सर झुका लिया।
तिवारी जी का उस बूढ़े व्यक्ति से इस तरह पेश आना मेरे दिल को गहरा चोट पहुंचाया। दूसरे दिन जब मैं बैंक जा रहा था तो उस पेड़ के पास पहुंचते ही मेरी नजर उस ओर गई। पर यह क्या,आज वह बूढ़ा वहाँ नहीं बैठा था। मेरे मन में तरह- तरह के भाव उठने लगे।
दिन बीतते गये। अब वह पेड़ की तलहटी सूनी दिखाई देती थी। कोई छह महीने बीत गये। एक दिन रोज की तरह मैं और तिवारी जी नाश्ता करने के लिये जा रहे थे। जैसे ही उस पेड़ के नीचे पहुंचा , वहाँ का दृश्य देखकर मैं चौंक गया। उस पेड़ के नीचे एक दस-बारह साल का लड़का एक चादर बिछाये रंग बिरंगी मिट्टी के खिलौने सुराही, घड़े आदि बेच रहा था। हाथी, घोड़ा, शेर ,भालू, राजा, दरोगा, सेठ-सेठानी,और क्या -क्या! इन नन्हें खिलौने को इतनी खूबसूरती से तराशा गया और रंग किया गया कि मानों वे अब बोल उठेंगी। मुझसे रहा न गया। मैं उस लड़के से पूछा-"बेटा, यह खिलौने कौन बनाता है ?" वह तुरंत बोला-"वह मेरे बाबा बनाते हैं और मैं बेचता हूँँ।" "पर कौन हैं तुम्हारे बाबा?पहले तो यहाँ एक बूढ़ा लोगों के हाथ देखता और भविष्य बताता था !" मैंने पूछा। "हाँ ,वही मेरे बाबा हैं।" लड़का बोला। " कहाँ रहते हैं वो, मुझे उसके पास ले चलोगे?" मैंने पूछा। उस लडके ने पासवाले शरबत ठेलेवाले भैया को अपने सामान देखने कहा और हमें लेकर पीछे एक गली में ले गया। वह हमें एक छोटी - सी झोपड़ी के अंदर ले गया। पीछे की ओर एक बूढ़ा चाक पर बैठा हुआ था। चाक चल रही थी और वह बूढ़ा अपने हाथों से सुंदर सुराही तराश रहा था। थोड़ी दूर पर कई घड़े, सुराही आदि रखे थे। एक तरफ आँच मे घड़े सुराहियां, खिलौने आदि तप रहे थे। हम निर्निमेष उसे देखते रहे। वह बूढ़ा हमारी आहट नहीं सुन पाया। वह उठा और एक छोटे कमरे में गया वहाँ साँचे, तरह -तरह के रंग तूलिकायें बिखरी पड़ी हुई थी। वह बूढ़ा बैठकर उन तपे हुये खिलौने को लेकर हाथ में पतली ब्रश लेकर सामने पड़े रंगों में डुबा डुबाकर उस खिलौने को रंगने लगा। कुछ ही मिनटों में वह खिलौना रंग बिरंगा और जीवंत हो गया। हमारे आश्चर्य की सीमा न रही।
"बाबा!", मैंने पुकारा। वह बूढ़ा चौंककर घूमा और हमारी ओर प्रश्नार्थक दृष्टि से देखने लगा। उसके चेहरे पर कई भाव आ जा रहे थे। शायद वह हमें पहचान लिया था।
मैंने पूछा -" बाबा, यह सब क्या? आप कहाँ चले गये थे इतने दिन ?और आज---।" मैं आगे कुछ बोलता इससे पहले वह बूढ़ा बोल उठा।
"हाँ बाबू, कभी मेरा जीवन अच्छा था। बिहार के आरा जिले में मेरा गाँव था।गाँव में घर खेतीबाड़ी सब था। पर मेरे सगे संबंधियों ने मुझसे धोखा करके सारी जमीन हड़प ली। मैं लाचार होकर गाँव छोडकर अपनी पत्नी के साथ यहाँ इस शहर में आ गया ।दोनों एक झोपड़ी डालकर कुछ मेहनत मजदूरी कर जिंदगी गुजार रहे थे। हमारी कोई संतान नहीं है। पर ऊपरवाले को शायद यह भी मंजूर नहीं था। मेरी पत्नी टाइफाइड से चल बसी। जैसे जैसे उम्र बढ़ती गई ,मैं मजदूरी भी नहीं कर पा रहा था। मैं पढ़ा- लिखा हूँ । मैंने मैट्रिक पास की है और मेरे दादाजी से कभी ज्योतिष और हस्तरेखा विज्ञान सीखी थी। मेरे पास उनकी ज्योतिष की किताबें हैं। हाँलाकि आजकल लोग ज्योतिष पर विश्वास नहीं करते ,मेरे पास और कोई चारा नहीं था। तब मैंने यहीं सड़क के किनारे अपना ज्योतिष ग्रंथ लेकर लोगों की हाथ देखना शुरू किया।मैं किसी को धोखा नहीं देता और लोगों को उनके भाग्य के बारे में बताता। और मैं लोगों को उनके जीवन में आनेवाली विपदाओं को नहीं बताता ,बल्कि कुछ उपाय बताता और भगवान की प्रार्थना करने की बात कहता। पर यह काम भी नहीं चला। घर में पैसों के लाले पड़े थे। उस दिन मैं आपलोगों को इस आशा से पुकारा कि बीस पच्चीस रुपये मिल जायेंगे तो मेरा उस दिन की रोटी निकल जायेगी। पर आपने मुझे झिड़क दिया। आप की वह बात कि अपना भाग्य मैं क्यों नहीं देखा ,मुझे अंदर तक हिला दिया। मुझे लगा कि सचमुच मैं अपना भाग्य आज तक क्यों नहीं देखा। तब मैंने अपनी कुंडली देखी। मेरी कुंडली में सिर्फ कष्ट ही था। जीवन गुजारने के लिये संघर्ष ही लिखा था।"
बूढ़े ने एक लंबी सांस ली और फिर कहना शुरू किया-" मैंने देखा कि ज्योतिष से कुछ पैसे नहीं मिल रहे,मजदूरी मैं कर नहीं सकता,तब मैंने कुम्हारों की टोली में जाकर घड़े सुराही खिलौने आदि बनाना सीखा। इसमें मेहनत करनी पड़ती है,पर ज्यादा शक्ति की जरूरत नहीं होती।मैंने लगन से काम सीखा और अपने झोपड़ी में पीछे चाक बैठाकर काम करना शुरु किया। एक दिन भगवान ने मेरी ही तरह एक अनाथ बालक दीनू से मिला दिया। मैंने उसे पाल लिया। वह मिट्टी ढोता और रौंदता है। मैं चाक पर घड़े सुराही खिलौने बनाकर उसे पकाकर रंग करता हूँ। बने बनाये घड़े सुराही खिलौने उसी पेड़ के नीचे रखकर उस लड़के को बैठाकर बेचता हूँ । वह पेड़ मेरे लिये भाग्यशाली है। बिक्री से अच्छे पैसे मिल जाते हैं।
बाबूजी, मनुष्य अपना भाग्य लेकर आता है, पर कर्म नहीं लाता। कर्म अपने हाथों से करना पड़ता है। अच्छे कर्म या काम करने से भाग्यरेखा भी बदल जाती है। मनुष्य अपने भाग्य से नहीं बल्कि अपने कर्मों से बड़ा होता है।" उस बूढ़े ने अपनी बात समाप्त की।
"बाबूजी रुकिये , आपके लिये चाय बनाता हूँ!" कहते हुए वह बूढ़ा उठा। "नहीं बाबा, आप कष्ट न करे।" मैंने मना कर दिया। तिवारी जी के आंखों में आंसू थे। उन्हें कई दिन पहले कहे अपनी बात पर पश्चात्ताप हो रहा था। उन्होंने अपने दोनों हाथ जोड़कर कहा -"बाबा मुझसे भूल हो गई, मुझे माफ कर दीजिए।" "नहीं ,बाबूजी ऐसा न कहिये!" वह बूढ़ा बोला।
मैंने भी हाथ जोड़कर बूढ़े को नमस्कार किया। मुझे ऐसा लगा मानों मेरे सामने साक्षात् श्रीकृष्ण खड़े होकर कर्मयोग का उपदेश दे रहे हों।
- पेरी सूर्यनारायण मूर्ती "दिवाकर"
(यह मेरी मौलिक रचना है। सर्वाधिकार सुरक्षित।
(मुखचित्र गूगल से साभार।)

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