दूर होकर तुम मुझे प्रीत की वो अनुभूति दे गया
जिस पर कोई रंग ना चढ़े प्रेम कि वो भभूति दे गया।

वह तेरा अपलक नैनो का निहारना ,
हृदय के अंत स्थल में ऐसा उतरा ,
फिर कोई आकर्षण ना आकर्षित कर सका,
वह तेरा चंद पल का सानिध्य वह विरक्ति  दे गया।

पा लेने का नाम पर तुमको पाके सब पा लिया ,
जब तुम गए प्रियतम मेरे मैंने सब कुछ खो दिया,
अब कोई  तृष्णा बची ना लालसा ,
चन्द  पल का मिलन  एक अदभुत सी तृप्ति दे गया।

यह दुनिया तो करती भरोसा,सुनी  बातों पर,
अब कैसे दिलाऊं यकीन मैं,तू है मेरे जज्बातों में ,
उतरा  है तू मेरी रूह के एहसासों में,
यह बस मेरा मन समझा तू नैनों से मुझे जो मौन स्वीकृति दे गया।

पहुँचेगी मेरी आवाज ,सारे नदिया सागर के पार,
जब हद से दर्द बड़ेगा मैं खुदको सभाल लुंगी,
जिसके सहारे मै तन्हाई के सारे पल विसार दुंगी  ,
ह्रदय की व्यथित वेदना को , तू वो सुखद स्मृति दे गया।

अंजू दीक्षित,
बदायूँ,उत्तर प्रदेश।