"शादी में नई-नई आयी बो ससुराल में खुद को एडजस्ट करने की कोशिस कर रही थी।
परिवार को प्यार और अपनेपन से एकता के सूत्र में बांधना चाहती थी,और खुद भी उसी परिवार का एक अहम हिस्सा बनना चाहती थी।
सर्दियों के दिन थे, घर के सभी सदस्य छत पर धूप का आनंद ले रहे थे, और बो घर का सारा काम निपटा कर नीचे ठिठुरन भरे कमरे में बैठ कर टी.वी. देख रही थी।
क्योंकि वह अभी नई नई आयी घर में घर की बहू है इसलिए उसे छत पर जाने की इजाजत नही है।
तभी मोबाइल की घण्टी बजी देखा तो माँ का फोन था।
"हैलो माँ! कैसी है आप"?
माँ के कुछ बोलने से पहले ही उसने माँ से प्रश्न कर दिया।
"मैं ठीक हूँ बेटा तू कैसी है"।
"माँ!! मैं भी ठीक हूँ पापा कैसे है"? उसने फिर पूछा
"बेटा! यहां सब ठीक है तू बता घर के सब लोग कहाँ है"?
"माँ! नीचे बहुत सर्दी है तो सब लोग छत पर धूप ले रहे है"।
और तू क्यों सर्दी में बैठी है तू भी जा छत पर धूप लेना जरूरी है बेटा !
"नही माँ मैं नही जा सकती क्योंकि मैं बहु जो हूँ मुहल्ले के सब लोग देख लेगें"।
"काश मैं तुझे मुठ्ठी भर धूप दे पाती बेटा"!
"कोई बात नही माँ ! मैं ठीक हूँ आप परेशान मत हो, ठीक है माँ मैं फोन रखती हूँ आप अपना और पापा का ख्याल रखना"।
यह कहकर उसने माँ को तो समझा दिया लेकिन खुद के मन में एक सवाल बैठ गया।
"कि जो बेटी मायके में खुले आसमान में पतंग की तरह उड़ती थी, हिरनी की तरह चंचल और चिड़िया की तरह फुदकती रहती थी, वही बेटी ससुराल में कदम रखते ही कब एक जिम्मेदार बहु बन जाती है पता ही नही चलता"।
या यों कहें कि ससुराल की वंदिशे उसे जिम्मेदार बना देती है।
तभी छत से सासूमाँ की आबाज आयी "अरे बहु! सबके लिए चाय बनाकर सीढ़ियों तक पहुंचा दे जरा"??
सच में बेटियां उस लता के समान होती है जो पनपती तो है पिता के घर लेकिन अपने संस्कारों को खुशबू से महकाती है ससुराल का घर।
फिर चाहे उस पर लाख बन्दिशें लगाई जाए लेकिन वो महकना (अपना कर्तव्य) नही छोड़ती।।
यह सोचती हुई बो चाय बनाने किचिन की तरफ बढ़ी।।
(स्वरचित एवं मौलिक)
शीला द्विवेदी"अक्षरा"

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