प्रेम दिया था उनको अपना,
जोरुँ अपने परिवार से.....
ना प्रेम की नींव बनी थी,
छोड़ गयीं इस संसार को.....
क्या माँगूं में रब से उनको??
पल-पल याद रुलाती है.....
जब देखूं लटकती 'पगडंडी' को,
उनकी याद आ ही जाती है.....
जिन्दगीं भी महरोम बन गई,
ना चिंता ना फिकर है.....
एकांत बराबर चलता जाऊँ,
अब नींद में भी जलन है.....
बस सिमटकर रखा हूँ,तेरी यादों को
बैठे स्वप्न सजाऊँ.....
बाँध दिया सबने मिलकर बंधन में,
अब तुम्हें क्या मूँह दिखाऊँ??...
कभी-कभी आत्मा कहती है....
हिम्मत ना हार,चिंतन सुधार,
मैं तेरे चितवन में बसी हूँ.....
जब भी याद करेंगे मुझको,
मैं हमेशा तेरी ही बनीं हूँ.....
लेखक:- विकास कुमार लाभ
मधुबनी(बिहार)

1 टिप्पणियाँ