भोले का अमृत जिसने पिया,
संसार को कभी भाव न दिया,
रत रहा हरदम महाकाल में
मन मेरा फिर हुआ रंगरसिया .....।

शरण उसकी अपना लेते जो,
दर्शन हृदय से पा लेते वो,
चित्त में उसे बसा लेते जो,
जीने का सार उसने समझ लिया
रत रहा हरदम महाकाल में
मन मेरा फिर हुआ रंगरसिया .....।

क्या बड़ा है उस विषधर से,
विश्वास न डिगता उसपर से,
काँपें पापी जिसके डर से,
जहर सारा उसने कंठ में भर लिया
रत रहा हरदम महाकाल में
मन मेरा फिर हुआ रंगरसिया .....।

माँ गंगा जहाँ विराजती,
बहती और फिर जग सवाँरती,
पृथ्वी सारी जिसका रूप निहारती,
शशी को उसने सर पर धर लिया
रत रहा हरदम महाकाल में
मन मेरा फिर हुआ रंगरसिया .....।

भक्ति उसकी प्रेम से लबालब है,
मोक्ष,माया,शांति यहाँ सब है,
दूर वो भी हमसे आखिर कब है,
हर दुख को मेरे हौले से हर लिया
रत रहा हरदम महाकाल में
मन मेरा फिर हुआ रंगरसिया .....।

जय महाकाल🔱
स्वरचित व मौलिक✍
सुमित सिंह पवार "पवार"
उत्तर प्रदेश पुलिस
आगरा