जब भी मन की साधना, लेती है आकार।
तब मिलता है लेखनी, को यारो विस्तार।।

मन के भावों को अगर,मिले शब्द का संग।
कागज तब मुखर हों, रचना रूपी रंग।।

मन मंदिर मानिंद है, भाव साधना रूप।
रचना में उठने लगें, एक सुहानी धूप।।

निर्मल होती लेखनी, तब ढलते हैं छंद।
स्वयं शारदे ज्ञान दे, मानव तो मतिमंद।।

श्वेता मन की भावना, मत समझो निर्मूल।
भावों सब मानिए, हैं पूजन के फूल।।