ला लोरोना कौन थी। सत्य थी या झूठ। अनेकों बार झूठे किस्से लोगों के मन में बस जाते हैं। बचपन से सुनती आयी बातों को सत्य मान लेते हैं।
जेल में बंद एक बंदिनी अपने बच्चे को कहानी पढकर सुना रही थी। जेल में बंद महिलाओं के छोटे बच्चे उन्हीं के साथ रहते हैं। जेल प्रशासन भी उनका ध्यान रखता है।
"माॅ। यह ला लोरोना कौन थी।"
"बहुत बुरी औरत थी। पापी थी। नफरत की पात्र थी।"
"आखिर क्या किया था उसने।"
"अपने ही बच्चे का वध किया था। फिर बहुत रोयी भी थी। पर ऐसा रोना क्या। सुना है कि वह मरकर भूतनी बन गयी। भूतनी भी रोती रहती।"
पास ही बैठी दूसरी बंदिनी रो रही थी। पिछले दो सालों से वह इसी जेल में बंद है। हालांकि महिला अभियुक्त को अदालत अक्सर जमानत पर आजाद कर देती है। मुकदमे के निर्णय के बाद फैसला होता है। पर उसकी जमानत नहीं हुई। न तो उसका कोई पक्षकार था। न उसका कोई बकील। कानून के मुताबिक उसे अदालत ने ही बकील उपलब्ध कराया। पर वह तो बस खानापूर्ति थी। बकील तो तभी मुकदमा सही तरह से लड़ते हैं जब उन्हें कोई फायदा हो रहा हो।
सीमा दिन भर जेल के काम करती और रात होते ही रोना शुरू कर देती। कभी कभी एक दो घंटे रोकर चुप सो जाती। कभी कभी रोते रोते पूरी रात गुजार देती।
" ऐ। तेरे पास कोई काम नहीं है। हमें तो सोने दे। ला लोरोना कहीं की।"
इस जेल में बहुत सी महिलाएं अपनी सजा काट रहीं थीं। छोटी मोटी चोरी से लेकर, जेब काटने बालीं, बड़े बड़े अपराधों में शामिल अपराधी, बेटी समान बहू को जला देने बाली सास और बहुत सारी तो झूठे मुकदमों में बंद थीं। पर इस जेल में ला लोरोना केवल वही थी। सभी की घृणा की पात्रा।
सीमा सोच रही थी। क्यों कर दिया उसने वह गहन पाप। जिन बच्चों पर वह अपनी जान छिड़कती थी, उसी की हत्यारिन बन बैठी। ला लोरोना बन बैठी।
राजेश से उसका विवाह हुए सात साल बीत गये। औलाद का सुख नहीं मिला।
उसकी छोटी बहन सुनीता बहुत छोटी थी पर चालाकी में ज्यादा होशियार। पति के पास पैसे की कमी नहीं और सुनीता के पास हुस्न की कमी नहीं। फिर सीमा बांझ। वैसे भी मर्द को कौन रोक सकता है।
उम्मीद थी माता पिता से। शिकायत की। पर अलग ही नतीजा मिला।
अरे यह तो हमने सोचा ही नहीं। अब छोटी भी व्याह लायक है। उसकी शादी में भी अच्छा खर्च करना होगा। अच्छा है कि सुनीता का विवाह राजेश से ही कर देते हैं। कुछ लोग बोलेंगे। आयु का अंतर भी बतायेंगे। पर लोगों का क्या है। बोलते हैःपर फिर चुप हो जायेंगें।
पर बोलेंगे ही क्यों। इसे छोटी बहन का त्याग का रूप दिया जायेगा। छोटी ने बड़ी का जीवन संवारने के लिये खुद की कुर्वानी दी।
सीमा की छोटी बहन सुनीता उसकी सौत बन गयी। घर की मालकिन बन गयी। सीमा घर की नौकरानी पहले थी और अब भी। पर सभी रिश्तेदार सुनीता की तारीफ कर रहे थे। सीमा को सीख दे रहे थे कि छोटी से अच्छा व्यवहार रखना।
जो हुआ सो हुआ। पर छोटी का व्यवहार बड़ी बहन के प्रति अच्छा न था। राजेश भी छोटी के ही साथ रहता। उसी से पूछता। उसके साथ घूमने जाता। उसके लिये नित कपड़े लाता। नये गहने तैयार कराता। और सुनीता नये कपड़ो और गहनों को पहन इठलाकर चलती।
सुनीता के पहली संतान लड़की हुई। अब सुनीता चिंतित। अगर दूसरी संतान भी लड़की हुई तो उसका भी सम्मान गया।
अक्सर जब राजेश काम से बाहर जाता तो घर में भूरी काकी आती। भले ही भूरी काकी उन्हीं की जाति की थी पर रोज रोज आने का क्या कारण।
भूरी तंत्र मंत्र का आडंबर करने बाली स्त्री,स्त्रियों की मनोदशा जानती थी। उसका लाभ उठाती। तंत्र मंत्र भला क्या काम करता। पर प्रोबेबिलिटी का सिद्धांत, उसकी आधी बातें सही हो जातीं। आधी गलत बातों का दोष भी आसानी से दूसरे पर रखा जा सकता है। मेरी तरफ से कोई कमी नहीं। तुम्हीं साधना ठीक से नहीं कर पायी। तुम्हारा ही मन विचलित हो रहा था। बहुत बार साधना पर शंका भी की थी। शंका से की जाने वाली साधना कभी सफल नहीं होती।
सुनीता का भाग्य अच्छा था। इस बार लड़का हुआ। पर सुनीता की नजर में यह ईश्वरीय विधान न था। यह भूरी काकी का आशीर्वाद था।
दरबाजों के भी कान होते हैं। फिर सीमा तो घर में रहती थी। सुनीता को पुत्र मिला तो भूरी काकी की कृपा से। मैं भी भूरी काकी को मनाऊंगी। उनकी बतायी सारी साधना करूंगी। अपना सम्मान प्राप्त करूंगी।
भूरी ने बाल धूप में ही सफेद नहीं किये थे। जानती थी कि सीमा माॅ नही बन सकती। पर इस तरह बोलकर अपनी इज्जत खत्म नहीं कर सकती थी।
" उपाय बहुत कठिन है। लगभग असंभव है। बच्चे की बलि देनी होगी।"
" नहीं। नही। ऐसा अनर्थ नहीं कर सकती। मैं बांझ ही अच्छी हूं।"
भूरी भी खुश। चलो बला टली।
बक्त आगे बढता गया। सीमा बच्चों पर जान लुटाती। दोनों बच्चे भी उसे सगी माॅ जैसा प्यार करते। सुनीता को भी आराम था।
एक दिन
" अरे छोटी। बहुत दिनों से कहीं घूमने नहीं गयीं। अभी तो तुम्हारी घूमने फिरने की उमर है। खेलने खाने का समय है।"
" घूमने जाती तो हू।"
" अरे बाजार जाना कहीं घूमना है। घूमना तो वह होता है। चल रहने दे। तुझे पता नहीं है। पता चला तो बुरा लगेगा।"
सीमा ने आग लगा दी। सुनीता भी पता किये बिना चुप कहाँ रहती। फिर सीमा ने राजेश के साथ घूमने का वह वृत्तांत सुनाया कि सुनीता भीतर तक जल गयी। वैसे भी दोनों में बहन का रिश्ता था ही कितना।
जैसे सीमा घूमने गयी थी, उसी तरह उसे भी घूमने जाना है। वह तो बड़ी के मुंह से गलती से निकल गया। नहीं मुझे तो पता ही नहीं चलता।
राजेश समझा समझा कर हार गया। बच्चे छोटे हैं। फिर कभी चलेंगे। पर सुनीता नहीं मानी।
वह अंधेरी रात थी। भूरी अपने घर सो रही थी। किसी ने दरबाजा खटखटाया।
". अरे सीमा। इतनी रात को।"
" काकी। सब इंतजाम कर दिया है। अभी चलो।"
इतने दिनों में तो भूरी सब भूल चुकी थी। पर जब सीमा ने याद दिलाया तो भीतर तक डर गयी। अरे। इसे क्या हुआ। अपने ही बच्चों की बलि देगी।
"नहीं हैं वे मेरे बच्चे। मेरी सौत के बच्चे हैं। उनकी बलि देकर अपनी गोद भरूंगी। कुछ भेंट लायी हूं। " सीमा ने अपने सारे गहने भूरी को सोंप दिये।
भूरी किंकर्तव्यविमूढ़। एक तरफ गहने और दूसरी तरफ बच्चों की जान। वह किसे चुने। निश्चित ही भूरी गहने चुनेगी। पर वह इतनी मूर्ख भी नहीं है। भूरी सीमा के साथ नही गयी। वह अपने घर से ही मंत्र तंत्र कर देगी। जैसे ही घड़ी में रात के बारह बजे। दोनों बच्चों का गला काट देना।
यह थी सीमा के ला लोरोना बनने की कहानी। वह उसी दिन से जेल में बंद है। कोई भी उससे मिलने नहीं आया। न पिता, न माता, न पति, न बहन। उसकी जमानत भी किसी ने नहीं करायी। भूरी की जमानत उसी समय हो गयी थी। अदालत में भी उसके बकील ने ऐसी दलीलें पेश की हैं कि वह बेगुनाह सिद्ध हो जायेगी। पर सीमा को अपना जीवन इसी जेल में काटना है। ला लोरोना बनकर इसी जेल में रोज अपने आंसू बहाने हैं। पर क्या वह अकेली इस अपराध की दोषी है। उसके साथ दोषी हैं, उसका पति जिसने उसे प्रेम नहीं दिया, उसकी बहन जिसने उसे धोखा दिया और उसके माता पिता भी, जिन्होंने उसकी पीड़ा न समझी। पर दुख की बात यही है कि केवल सीमा ला लोरोना है। वह जिंदगी भर इस जेल में आंसू बहायेगी।
समाप्त
दिवा शंकर सारस्वत 'प्रशांत'

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