चुरा लिया है मोबाइल ने
उन सुंदर पलों को
जब दादा बुआ भतीजे मिलकर
खेलते थे लूडो को ।

चुरा लिया है मोबाइल ने
उन सुखद पलों को
जब मूंगफली खाते हुए रात में
सुनते थे कहानियों को ।

चुरा लिया है मोबाइल ने
उन जज्बाती लम्हों को
जब परिवार साथ बैठकर
समय देते थे एक-दूसरे को ।

चुरा लिया है मोबाइल ने
उन हसीन लम्हों को
जब एक की हंसी बढ़ा देती 
सब की मुस्कुराहटों को ।

चुरा लिया है मोबाइल ने
उन सब जानकारियों को
जो देते थे घर के बड़े और बुजुर्ग
अपने नौनिहालों को ।

ऐसा नहीं है कि मैं इसके खिलाफ हूं
बहुत दूर वालों को इसने पास कर दिया है
सुविधाएं भी बहुत तरह की दे दी
लेकिन भुला दिया है अपनेपन को ।

तब अकेला कोई नहीं था
ना कोई अकेला रहना चाहता था
अब तो मोबाइल के चक्कर में
पसंद करने लगे हैं तन्हाई को ।

अब तो ये ही पूरी कर देता
बहुत सी आवश्यकताओं को
बस ये ही पास हो अपने 
भुलाने लगे हैं अपनों को ।