होटल का मिला हमें, 
वही कमरा,
पिछली बार गये थे, 
जब हम, 

हम सब गये थे शिरडी, 
बच्चे थे साथ, 
चाहिए थे हमें बेड चार, 
मिले तीन, 

पहुँचे जब कमरे अंदर, 
बच्चे सब, 
देख नज़ारा वहाँ का, 
हो गये खुश, 

कहा एक ने पलंग मेरा,
मैं हतप्रभ, 
तभी दूसरी भी बोली, 
ये पलंग मेरा, 

दर असल बात थी ऐसी, 
पलंग थे दो, 
पलंग ऊपर जाने थी सीढ़ी, 
बड़ी प्यारी, 

बच्चों के मन भाई वो सीढ़ी, 
बनी उसमें रेलिंग, 
पिछले बरस भी मिला हमें, 
यही कमरा होटल का ।


    काव्य रचना -रजनी कटारे 
          जबलपुर (म. प्र.)