चार दिवारों में सिमटे हुए, इस बिखरे से जीवन को, जीने की जद्दोजहद से जब थक जाओ, संघर्षों की धूप की तपिश से जलते पथ पर चलते हुए जब पांव के छालों को सहलाओ, अपने दायरों में बंधे से, अपने कर्मपथ पर बढते हुए, अपने कर्तव्यों से मुक्त हो जाओ, तो चले आना- प्रिय!! मैं सागर किनारे की रेत बन तुम्हारी हर थकान समेट लूंगी अपने दामन में! आज मैं तुम्हारे ज़हन में बसे नामों की फेरहिस्त में कहीं आखिरी पायदान पर हूँ शायद.. या फिर, मैं अब तुम्हें याद भी नहीं शायद.. मगर मुझे न गिला है तुमसे कोई न ही कोई शिकायत है अब! मैं भी तुम्हें नहीं पुकारूंगी अब! किंतु, एक दिन जब यूँ ही अपनी थकी सी आंखों से- ताकोगे साँझ के ढलते से सूरज को, तब, दूर कहीं उस क्षितिज के समीप, तुम्हारी नज़र के अंतिम छोर पर, तुम पाओगे मुझे- कुछ शीतल सी होती, फिर भी तपती सी उन अग्नि किरणों में, बनकर छाया सी तुम्हें वहीं मिलूंगी-मैं! जानती हूँ, कुछ संकोची हो जाओगे तुम, यह जो दूरियां बनाई हैं तुमने, इन्हें मिटाने से झिझोके भी तुम! कोई शंका मन रखना मन में चले आना प्रिय कि यकीन दिलाती हूँ तुम्हें मैं नहीं बदलूंगी कभी ले लो जितना समय लेना है तुम्हें तुम आना बेझिझक जब भी! जो थी मैं कभी तुम्हारे लिए सदा वही रहूंगी मैं जब चाहे, आ जाना, तुम्हें यहीं मिलूंगी-मैं! 
शालिनी अग्रवाल