हर्षित मन और चंचल दृग है,
नारि नवेली पनघट को चली है।
करत विनोद हँसत मन ही मन,
संग सोहति सब सखी भली है।
बोलत पंथ दिखो इक कागा,
छेड़ि दियो तब हसि इक अली है।
पिय आवन सन्देश कहत है,
सुनि हरषी ज्यों पुष्प कली है।
शीला द्विवेदी"अक्षरा"
उत्तर प्रदेश
रश्मिरथी सभी अधिकार सुरक्षित 2018-2022
1 टिप्पणियाँ