शायद ! कहने भर को रह गयी हूँ ,
माता ? मैं, गौ माता !
जिस मां की कोख से जन्मा बेटा उसकी पीर नहीं
समझ पाता, उसके दुःख दर्द, दूर न कर पाता।
वो भला, आज के ज़माने में, हमारी पीर
कैसे समझेगा ?
इन हालातों में, हमारे दुःख दर्द, दूर कर,
कैसे सकेगा ?
हमारी दुर्दशा पर मुझे उतना दुःख नही है, जितना
दुःख ,मुझे इस बात पर है कि,इंसानों को आज हमारी
सेवा के लिए चंदा लेने की, हमारे प्रति, सेवा भाव
जाग्रत करने की नौबत आ गयी है ,पहले तो कभी
ऐसा नहीं होता था, सभी मेरा भरपूर ख्याल रखते थे ,
अब हमारी बदहाली दूर करने के लिए, हमारे सेवक
हमारे लिए धन अर्जित करते हैं ताकि हमारा पालन
पोषण हो सके, हमारे परिवार पल सकें।
अब बात परिवार की आयी है तो कह दूं सीधे सीधे
(वैसे तो हमारी जात ही बहुत सीधी है)
हमारे परिवार की फ़िक्र कौन करेगा,
आज के इंसान को अपने परिवार
की ज़्यादा फ़िक्र रहती है, अब आप इस गलतफहमी
में मत रहना , जिस परिवार की मैं बात कर रही हूँ
उसमें भाई बंधु, माँ बाप, दादा दादी सभी होंगे,
अरे भई किस ज़माने की बात कर रहे हो तुम
वो दिन लद गए, जब भरा पूरा परिवार हुआ करता
था ,अब जैसे - जैसे विज्ञान ने तरक़्क़ी कर ली है,
बड़ी-बड़ी चीजों तथा बड़े बड़े उपकरणों
का स्थान, छोटी छोटी चीज़ों ने ले लिया है ।
शायद वैसे ही तरक्क़ी के साथ आज के इंसानों का
दिल भी,लगता है?
आजकल छोटा हो गया है...बहुत छोटा
एक दम लघु रूप ? वैसे ही इंसान ने भी परिवार को
छोटा.... और छोटा.... कर लिया है एकदम अपनी
जरूरतों के मुताबिक, अब उसमें अपने माता पिता
भाई बहिन,या किसी अन्य का कोई स्थान ! नही रह
गया है ,सर्वोच्च स्थान पर तो पत्नी देवी ही विराजमान
हैं। बाकी अन्य स्थानोँ पर परिस्थितिनुसार पर अन्य
विराजित किये जाते हैं, ऐसे हालातों में बेचारा आज
का प्राणी, हमारी सेवा कैसे कर सकेगा, जब वह अपने
माँ बाप, भाई बहिन या अन्य की सेवा न कर पाने के
लिए विवश है, यह स्थिति तो तब है जब उसमें
स्वेच्छाशक्ति है, वैसे यह सुपर पावर आजकल सब
इंसानों में अब कम ही पायी जाती है।इसे परिस्थितियों
की विडंबना समझें, आप या क़िस्मत आज के मौजूदा
हालात सब जगह ऐसे ही हैं। इसलिए मुझे इसका गम
नही है कि हमारी, हमारे परिवार की, वह सेवा नहीं
कर सकता, मेरी भूख, भला उसे कहां बैचैन करने
वाली होगी । जब उसे ये ख़्याल ही नही कि,अपने हाल
पर मजबूर उसकी मां ( कोख से जन्म देने वाली) ने
खाना खाया होगा या नहीँ , इस बात की
उसे कतई फ़िक्र नहीं है ।
उसे बीवी के होंठों लगे रबड़ी के झूठे दोने चाटने की
ज़रुर फ़िक्र है । जो उसके लिए किसी अमृत पात्र से
कतई कम नही लगते हैं ,
ऐसा नही है कि वह आजकल
फिक्रमंद नहीं है ,
वह फिक्रमंद जरूर है,
पर अपने परिवार के लिए,
सिर्फ सीमित परिवार के लिए,
न सिर्फ परिवार सीमित किया है उसने,
बल्कि उसकी मानवीय संवेदनायें
भी सीमित हो गयीं हैं,
असीमितता तो आजकल उसकी इच्छाओं के पाले में
आ गयी है।
(मन ही मन यह बात सोचते हुए एक
गौमाता, दूसरी गौमाता से,अपनी मूक भाषा में, अपनी
पीड़ाओं के अनुभव बांटते हुए कहती है )
गौमाता: सुन बहन, मेरे मालिक के पड़ौस में एक बेहद
सज्जन व्यक्ति रह्ते हैं,वे दयालु हैं और पशु प्रेमी भी ।
अभी परसों की तो बात है ,
उनकी गाय ने पिछले महीने बछड़ा दिया था। बछड़ा
बेहद चंचल है और नादान भी अपनी माँ की हिदायतों
को नजरअंदाज करके वह पास के बगीचे में चला गया
था वहाँ इधर उधर कुलाँचे मारने लगा, नन्हें पौधों के
शहीद होने की चिंता में बगीचे के माली ने सूखी टहनी
से उसे मारा ,मार खाकर उसे मां की हिदायतें याद
आयीं । चल दिये बछड़े बाबू मुँह लटकाये , अचानक
उसकी नज़र सूखी रोटी पर पड़ी उसके ऊपर किसी ने
पॉलीथिन में सब्जी रख दी थी ,
थैली समेत खा गया, झटपट,वो नटखट,
सुना है रात भर दर्द से बिलबिलाता रहा मासूम
बेटे की पीड़ा में आँसुओं की धार बहाकर रंभाती रही
बेचारी माँ, माँ का हृदय मानो फट पड़ा था।
सुबह उसके मालिक ने पशु चिकित्सक से इलाज़
करवाया ,बछड़े को राहत मिली तब जाके कलेजा ठंडा
हुआ बेचारी माँ का, उफ्फ़ ये इंसान कब हमारी पीड़ा
समझेगा, इन्हें इस बात की भी फ़िक्र नही रहती कि
उसके अंगों की तरह हमारे अंग हैं, सड़ी गली चीज़ें
इधर उधर डाल देते हैं हम जानवरों को, चाहे हमारी
जान पर ही क्यों न बन आये। हमको ये चीजें नुकसान
पहुँचाती है, भूखों मरने से मजबूरन हमें ये खानी
पड़ती हैं हमारे पाचन अंग खराब हो जाते हैं।
पॉलीथिन भी हमें नुकसान पहुंचाती हैं,
फ़िलहाल इसका उपयोग कम हो रहा है
यह हमारे लिए एक अच्छी शुरुआत है।
हमारा दूध पीकर, इंसान, है ना ये इंसान ,
हृष्ट पुष्ट हुआ जा रहा है, हमारे बच्चों तक
को अपनी माँ का दूध नसीब नहीं होने देते, ये धन के
लालची इंसान, कितने कमज़ोर हो जाते हैं हमारे
बछड़े, अब हमारी कुर्बानी,हमारे दूध की कीमत क्या
समझेंगें , ये इंसान, अरे ..! जो खुद, अपनी मां का दूध
पीकर उसके दूध का फ़र्ज नहीं निभा पा रहा है,
फ़िर हम जानवरों की क्या बिसात,
सचमुच बहन,बहुत ख़राब ज़माना आ गया है,
इंसान क्या इस धरती पर भगवान तक ने पूजा
है हमको! और क्या अब हमारी क़द्र कम ?
हमें यूँ ही नहीं गौमाता कहा जाता है । माँ शब्द
की उत्पत्ति भी हमसे ही है.. हमारे पूर्वज कहा करते थे
समुद्र मंथन से उत्पत्ति है हमारी , इस धरती पे पाए
जाने वाले,जानवरों, पशुओं में, इकमात्र हम ही हैं।
जिनकी आवाज़ से माँ शब्द निकलता है,
यहाँ यह कहना बिल्कुल उचित है कि हम
पूजनीय हैं.........................
इसलिए हमें गौमाता कहते हैं।
आज का इंसान , भले ही विभिन्न प्रकार की दौलत से
अमीर बनने का दम भरता है, एक जमाना था
हमारी संख्या ही उसकी समृद्धि का प्रतीक थीं।
इस आर्य भूमि पर हमारी तीस नस्लें हैं,
इंसानों के लिए सभी फायदेमंद हैं
और हमारे लिए ये इंसानी नस्ल?
रुँधे हुए गले से रंभाती हुई बोली।
उसकी आवाज़ में दर्द स्पष्ट झलक रहा था
(इस कहानी का उद्देश्य किसी धर्म, जाति,भाषा, या अन्य किसी विशेष की भावनाओं को ठेस पहुँचाना नहीँ हैं । मूक भाषा के माध्यम से बेजुबानों के मर्म को वर्णित करते हुए , उनके कल्याण हेतु, मानव मात्र में चेतना जागृत करने के प्रयास किये हैं)

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