मुझे क्या पता था ये खुशी पल भर की थी , मेरे जीवन मे उथल पुथल मचाने के लिए तूफान आने वाला है, जो बच्चा मुझे एकदम ठीक लग रहा था अचानक से.अपनी माँ की गोद सुन्नी करके हमेशा के लिए सो जाएगा।
प्रेम जी आकर देखते है हास्पिटल का कमरा एकदम शांत हो रखा था ,ना कोई सिस्टर थी वहाँ ,मै पत्थर की मूरत बनकर बेड पर बाबू के पास बैठी थी।
प्रेम जी दो तीन बार मुझसे पूछते है प्रितम के लिए
बाबू सो गया क्या ?? थोड़े देर पहले तो खेल रहा था। लेकिन मै कोई जवाब नहीं देती हूँ एक शून्य होकर बाबू के चेहरे को तकती रहती हूँ। मेरे दोनो कंधो को हिलाकर बोले "प्रिति क्या हुआ तुम्हें कुछ बोलती क्यों नहीं हो ?? अब उन्हें मेरे नहीं बोलने पर गुस्सा आने लगा था वो मुझे जोर से बोलते है ,उनकी आवाज सुनकर सिस्टर वार्ड मे आती है।
प्रेम जी को बोलती देखिये थोड़ा हिम्मत से काम लिजिये ,आपके बेटे का शरीर शांत हो गया है। प्रेम जी अपनी जगह से हिल गए। उनके पैर लड़खड़ाने लगे वो सिस्टर से कहते है "ऐसे कैसे हो सकता है?? अभी थोड़े देर पहले ठीक था ,खेल रहा था , मैंने खुद अपनी आँखो से देखा।"
सिस्टर मै समझ सकती हूँ आपकी भावनाओं को लेकिन मै भी यही थी उसे दवाई देने आई थी। दवाई देने से पहले मै उसे खिला रही थी अचानक से उसे तेज खाँसी आई मुहँ से खून निकला, हड़बड़ाकर मै भागकर डाक्टर को बुलाने गई , जब तक डाक्टर आए तब तक आपका बेटा अलविदा कह चुका था।
प्रेम जी बाबू को छूकर देखते है उठाकर गोद मे लेते है। उसके हाथो को गालो को चूमते हुए फूट फूटकर रोने लगते है ,नहीं ...नही ..मेरा बच्चा मुझे छोड़कर नहीं जा सकता है।
थोड़े देर रोने के बाद वो जेब से फोन निकालकर मनु भैया को फोन करते है। उन्हें प्रितम की खबर देते है और कहते है घर मे सभी को आप ही खबर कर दिजियेगा। मेरी तो हिम्मत ही नहीं है कि मै मम्मी से बात कर पाऊँ।
प्रेम जी की नजर मुझ पर पड़ती है वो मेरे गोद मे प्रितम को देते है लेकिन मै उसे पकड़ती नहीं हूँ। प्रिति होश मे आओ ,देखो हमारे प्रितम को। वो अभी जग जाएगा। वो गहरी नींद सो रहा है। मुझे हर तरीका से दिलासा देने की कोशिश मे लगे हुए थे। लेकिन मै कोई प्रतिक्रिया नहीं दे रही थी।
आँखो मे आँसु लिए मनु भैया और रितेश भैया आते है। मनु भैया आते ही प्रितम को गोद मे लेकर उसे बहुत पुचकारते है। सीटी बजाते है शायद वो उठ जाए। पहले कि तरह सीटी की आवाज सुनकर मुस्कुराए। मगर हर प्रयास विफल हो गया था।
भैया प्रितम को रितेश भैया कि गोद मे दे देते है। रितेश भैया प्रितम को अपनी जान से ज्यादा प्यार करते थे।
"सबके सपनो को तोड़कर न जाने वो दूर कहाँ चला गया।
अपनी मम्मा से उँगली छुड़ाकर नभ का तारा बन गया।"
मनु भैया मेरे पास और प्रेम जी के पास ढांढस बँधाने आते है। लेकिन जो खुद टूटा हुआ है वो क्या जोड़ेगा।
भैया भारी आवाज मे धीरे से बोले ,आप लोग यही बैठिये ,मै हास्पिटल की सारी फार्मिलिटीस पूरी करके आता हूँ। भैया को आने मे एक घंटा लग जाता है।
पैपर्स बनवाकर सभी को घर चलने कहते है। सभी वार्ड से आँखो मे आँसू भरकर बाबू को गोदी मे लेकर जाने लगते है ,लेकिन मै अब भी वही बैठी थी , भैया आकर को मुझे उठाते है बोलते है संभालो अपने आप को। लेकिन मेरा शरीर का सत् साथ छोड़ चूका होता है। मुझे कुछ सुद्ध बुध्द नहीं थी। मुझे कुछ समझ मे नहीं आ रहा कि यहाँ क्या हो रहा है??
मनु भैया जबरदस्ती उठाते है अपने हाथ के सहारे पकड़ कर ले जा रहे थे , चलने के लिए मेरे पाँव उठ ही नही रहे थे। घसीड़ते हुए मै चल रही थी।
घर मे भी सबको पता चल गया था , माँ भाभी आसपड़ोस के सभी लोग एकत्रित हो रखे थे। घर मे मातम मचा हुआ था ,बिट्टू दीदी दौड़कर प्रितम को गोदी मे लेकर बेतहाशा रोए जा रही थी , मम्मी जी ,माँ ,भाभी सबका जिगरा फट फटकर रो रहा था।
"मेरे कुल का चिराग बुझ गया ,
घर की रौनक़ अपने संँग ले गया। "
अंतिम विदाई के क्षण सबके मुहँ सील गए ,आँखे बोल रही थी । भैया ,माँ और भाभी सभी अपने घर चले गए। दो दिन तक घर मे कोई किसी से ना बोला ,ना खाना बना, ना खाया ऐसा लग रहा था मानो घर मे कर्फ्यू लग गया हो।
मै अभी भी पत्थर बनकर बैठी थी , सूनी आँख़ो से एकटक मेरे बेटे कि छवि को निहार रही थी। पूरे कमरे मे उसके कपड़े ,खिलौने चीख चीख कर उसकी याद दिला रहे थे।
कभी ऐसा लगता वो रो रहा है ,भूख से तड़प रहा है।
मै बेबस लाचार माँ , उसे प्यार करना चाहूंँ ,उसे लोरी सुनाना चाहुँ ,मै कहाँ जाऊँ ,कहाँ से लाऊँ मै अपने लाल को मुझे कुछ समझ मे ही नहीं आ रहा था।
मै बिमार पड़ गई , ना खाना खाती ,ना.ही मुझे नींद आती। मुझे हर जगह प्रितम नजर आने लगा था।
एकदिन भैया अपने संग माँ को लेकर आए मेरे ससुराल।
माँ मेरे पास आई मेरे सर पर हाथ फेरी और बिटिया और कहा ई का हाल बना रखी हो। अपना ,मै माँ से नजरे चुरा रही थी। माँ भी समझ रही थी मेरी स्थिति को। वो मेरी ठुड्डी को पकड़कर उठाकर कहती "काहे हमसे नजरे चुरा रही है आँख मे आँख मिलाकर हमसे बात करो।" जैसे मेरी नजरे माँ से मिली माँ की आँख़ो मे आँसू देखकर मेरे अंदर जो सैलाब भरा पड़ा था वो उमड़ उमड़ कर घड़ा फूट पड़ा।
मै फूट फूटकर माँ से बच्चे की तरह गले लगकर बेइंतहा रो रही थी । मैनै माँ से रोते रोते बोला माँ जब भगवान को लेना ही होता है देता क्यो है ? ?
भगवान ने मुझे समझ क्या रखा है ?? पहले दो पिता का साया मुझसे छिन लिया ,मैनै बर्दाश्त कर लिया लेकिन बच्चे से बिछड़ने का बिछोह कैसे सहे माँ
बोलो माँ।
माँ अब हम जीना ही नहीं चाहते है .. कहकर चिल्ला चिल्लाकर रोती ही जाती हूँ।
माँ ने कहा मेरे सर को सहलाते हुए जितना रोना है रो लो , रोओगी तभी मन हल्का होगा। जीना मरना तो हमारे हाथ मे नहीं है।
जब तक साँसे है तब तक हर किसी को जीना पड़ेगा।
बेटा प्रितम की इतनी ही जिंदगी थी , इसलिए वो चला गया अगर वो जिंदा रहता और उसे बिमारी की वजह से तकलीफ होती तो क्या तुम देख पाती। "नहीं न"
भगवान कि माया हम कभी समझ नहीं पाएंँगे।
लेकिन माँ मै कैसे ढाढस बाँधू जिन हाथो से मैनै उसे
खिलाया उसी हाथो मे उसने अंतिम साँसे ली। माँ उसका चेहरा मेरी आँखो के सामने चलचित्र के जैसे घूमता है।
माँ "बेटा वक्त को वक्त दो ,वक्त हर जख्म को भर देता है।"
तुमने तो अपना दुख देखा ,इतने दिनो से तुम बदहवास होकर पड़ी हो जवाई बाबू किससे कहे अपना दुख। दाढी बढा ली है। वो भी आधी बार खाते है आधी बार नहीं। वो बाप है तो क्या हुआ उनको भी दुख होता है बिटिया उनका भी दिल रोता है। देखना फिर तुमरी गोद हरी भरी होगी , फिर एक नन्हा लल्ला तुमरे अंँगना मे खेलेगा। चलो उठो अपना आपा संभालो।
तुम्हारे बिना घर देखो कैसन हो गवा है।
तभी मनु और प्रेम जी कमरे मे दाखिल होते है। माँ मनु भैया से कहती है जाओ एक बड़ा खाली बैग लेकर आओ और उसमे प्रितम के सारे समान भरकर कोठरी मे उठाकर रख दो। यह कहकर माँ और मनु भैया हम दोनो को छोड़कर नीचे चले जाते है।
मै और प्रेम जी कितने दिनो बाद एकदूसरे को ध्यान से देख रहे थे। दोनो की आँखो मे दर्द समाया हुआ था।
प्रेम जी मेरे पास आकर मेरे चेहरे और माथे को प्यार से सहलाते है। मै प्रेम जी के हाथो को अपने हाथ मे लेकर कहती हूँ। देखो न "प्रेम और प्रिति" रह गए मगर हमे जोड़ने वाला प्रितम छोड़कर सदा के लिए चला गया।
उन्होंने मेरे होठो पे उँगली रख दिए , मेरे सिर से अपना सिर टिकाकर इशारो से कुछ भी न कहने को कहा।
हम दोनो की आँखो से अश्रु की धारा बह गई।
हम दोनो एकदूजे से लिपटकर घंटों रोते रहे।
क्रमशः

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