जिस पिता की उंगली पकड़कर चलना हमने सीखा है
 उसके आगे सारी दुनिया की दौलत फीका है
 पर इस मुख से सुंदर स्वर् बोलना भी तो उनसे ही सीखा है।

पिता अपने आप में करुणा का समंदर है
 स्नेह का भंडार छिपा उनके ह्रदय के अंदर है
कोई मानो या ना मानो पिता अपने संतानों के लिए सिकंदर है। 

पिता का स्नेह है मां की ममता से कम नहीं 
पिता के स्नेह का वर्णन कर सके किसी की लेखनी में दम नहीं 
अपने संतानों के लिए वह क्या कुछ नहीं करते 
यदि वो कभी डांट भी दे तो हमें उसका गम नहीं।

बाहर सील सा कठोर
 पर कोमलता हृदय के  अंदर है
मानव स्नेह और प्रेम का
 बहता हुआ समंदर हैं।

पिता के स्नेह से बढ़कर
 कोई दूजा धन हो नहीं सकता
 भले सब भूल भी जाए लेकिन
 पिता भूल से भी भूल कर संतानों को भूल नहीं सकता।
सुशील चौधरी 
जंदाहा वैशाली बिहार