मेरे पापा मेरी जान थे,
उनसे ही था मेरा अस्तित्व और वही मेरी पहिचान थे।
उंगली पकड़ कर मेरी चलना सिखाया था,
दुनिया की हकीकत से रूबरू कराया था।
कभी इंसानियत और प्रेम का संदेश देते थे,
तो कभी रामायण और गीता का उपदेश देते थे।
जाति-पांति ऊंच-नीच को नही मानते थे,
अपनों और परायों में भी भेदभाव नही देखते थे।
सब ईश्वर के बनाये बन्दे है ऐसा  सुंदर भाव रखते थे,
कहते थे सब उन्हें प्यार से चाचाजी और वो बच्चों से प्रेम करते थे।
देते थे हमेशा शिक्षा धर्म और संस्कार की,
जान से ज्यादा चाहते थे हमें करते थे बारिस प्यार की।
चले गए वो बर्षों पहले हम सबका साथ छोड़कर,
करते हैं याद हम सब उन्हें आसमाँ में देखकर।
भले ही वो इन दुनिया से चले गए लेकिन मेरे दिल से दूर नही,
उनकी तुलना किसी और से करूँ ये मुझे मंजूर नही।
जब बात पिता के रूप में किसी को देखने की आती है,
तो लाख कोशिश करने पर भी छवि नही किसी की भाती है।
बस इतना लिख कर ही अपनी को विराम देती हूँ,
पिता के रूप में मैंने पाया है ससुर जी को उन्हें दिल से प्रणाम करती हूँ।।

शीला द्विवेदी "अक्षरा"